नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) आगामी नवम्बर में राजस्थान में राजस्थान विधानसभा के होने वाले चुनावों में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर रहेगी और दोनों ही पार्टियों को स्पष्ट बहुमत मिलने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। साथ ही दोनों पार्टियों द्वारा जीती जाने वाली सीटों में भी 8 सीटों से ज्यादा का अन्तर नहीं होगा। अग्रगामी संदेश द्वारा विभिन्न सूत्रों से जुटाये गये तथ्यों से साफ होता है कि कांग्रेस को 85 सीटों पर ही संतोष करना पड़ेगा। वहीं भाजपा को 82 से 90 सीटें तक मिल सकती हैं। उधर सीपीआईएम को 7 से 9 सीटें मिल सकती है। बसपा, एनपीपी, जनता दल यूनाईटेड एवं समाजवादी पार्टी सहित अन्य दलों को 21 से 30 सीटें मिल सकती है। ऐसी स्थिति में राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनने के आसार बनते जा रहे हैं और कांग्रेस और भाजपा में से जो भी पार्टी जोड़-तोड़ में सफल होगी वही सत्ता का ताज पहिनेगी!
भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके नेताओं के पास यह जवाब नहीं है कि वे वसुन्धरा राजे के आगे क्यों झुके? अवाम का सीधा-सीधा सवाल है कि पूर्व मुख्यमंत्री पिछले साढे चार साल से थी कहां? गहलोत द्वारा सत्ता सम्भालने के बाद वे अवाम और भाजपा को दरकिनार कर कोप भवन में जा बैठी और जब चुनाव आये और उन्हें राजस्थान में पार्टी की बागडोर सम्भलवाई गई तभी वे सक्रिय हुई! लेकिन पार्टी की बागडोर सम्भालने के बाद से आज तक भी उन्होंने यह नहीं बताया कि वे सत्ता में आने के बाद प्रदेश के अवाम के हित रक्षण हेतु क्या करेंगी? उनका गुड गवर्नेन्स का रोड़ मैप क्या होगा?
भाजपा की दूसरी बड़ी समस्या है, राज्य में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने से जुड़ा मसला। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा का एक धड़ा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के खिलाफ है। हालांकि इस धड़े में पूंजीपति और उनके पुछल्ले ही हैं, जबकि आम जैन समुदाय अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा प्राप्त करने के लिये संघर्षरत है। ऐसी स्थिति में अगर भाजपा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के मुद्दे पर अडंगे डालती है, तो उसके लिये यह घाटे का सौदा ही रहेगा।
भाजपा की अन्दरूनी कलह भी भाजपा को ले डूबने की स्थिति तक पहुंच गई है और चुनावों तक क्या स्थिति रहेगी, यह तो वक्त ही बतायेगा!
उधर कांग्रेस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अगुआई में अपने पिछले साढ़े चार साल की उपलब्धियों का बखान कर रही है! यात्राओं और सरकारी विज्ञापनों के जरिये जनता को बताया जा रहा है कि कांग्रेस की गहलोत सरकार ने उनके लिये क्या-क्या किया? लेकिन कांग्रेस पार्टी और सरकारी स्तर से कोई भी धरातलीय स्तर पर जाकर यह नहीं देख रहा है कि उनकी सरकारी योजनाओं से वास्तव में अवाम को क्या राहत या फायदा पहुंचा है? नतीजन अवाम धीरे-धीरे उनसे जुडऩे में कतराने लगा है। इसका खमियाजा कांग्रेस को उठाना ही पड़ेगा।
प्रदेश में जैन समुदाय की संख्या कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक हो सकती है! ऐसी स्थिति में अगर कांग्रेस पार्टी अपने वादे के अनुसार जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने में सफल रहती है तो जैन समुदाय का झुकाव निश्चित रूप से कांग्रेस की ओर बढ़ेगा और इसका फायदा कांग्रेस को निश्चित रूप से मिलेगा।
उधर मीडिया और चुनावी सर्वेकर्ता वामपंथी जनवादी दलों को नजरन्दाज कर रहे हैं। हालांकि उनकी भूमिका राज्य के इन विधानसभा चुनावों में इस बार महत्वपूर्ण रहने वाली है! लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि उन्होंने वामपंथी जनवादी दलों के 01 जुलाई, 2013 को हुए दिल्ली कन्वेशन को पूरी तरह राजस्थान में नकार दिया है और चार पार्टियों का जो तीसरा मोर्चा उन्होंने बनाया है उसमें अपने परम्परागत सहयोगियों को नजरन्दाज कर जनता दल सेक्युलर जैसे पार्टीयों को शामिल किया है। ज्ञातव्य रहे कि पिछले विधानसभा चुनावों में इस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष को जो वोट मिले थे उनकी गिनती सैंकडे की निचली पायदान पर थे। इससे माकपा को जमीनी स्तर पर नुकसान ही होगा। बसपा यथा स्थिति में है और उनके जीते हुए उम्मीदवारों का झुकाव भी कांग्रेस की तरफ ही रहेगा!
सांसद किरोड़लाल मीणा के मार्गदर्शन में खड़ी हुई एनपीपी राजस्थान में पहली बार चुनाव लड़ रही है और यह देखना है कि यह सिर्फ वोट काटू पार्टी साबित होती है या फिर अवाम में पैठ जमाती है। दोनों ही तरह से एनपीपी के उम्मीदवार भाजपाई उम्मीदवारों के वोटों में निश्चित रूप से सेंध मारेंगे, नतीजन नुकसान भाजपा को ही होगा! वहीं जनता दल यूनाइटेड को उनकी परम्परागत सीट मिलने की गुंजाइश है और सामाजवादी पार्टी सहित अन्य पार्टियां कांग्रेस या भाजपा के वोटों में सेंध मारने की परम्परा ही निभायेंगे।
कुल मिला कर यह तय ही लगता है कि राजस्थान में त्रिशंकु विधानसभा के आसार साफ-साफ नजर आ रहे हैं। इसमें जोड़-तोड़ की तिकड़म में जो पार्टी तेज पड़ेगी, सत्ता का ताज वहीं खैंच ले जायेगी। इसके साथ जो महत्वपूर्ण होगा वह यह कि वामजानवादी दल इस बार अपने वोट बैंक में अच्छा खासा इजाफा करेंगे।
भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके नेताओं के पास यह जवाब नहीं है कि वे वसुन्धरा राजे के आगे क्यों झुके? अवाम का सीधा-सीधा सवाल है कि पूर्व मुख्यमंत्री पिछले साढे चार साल से थी कहां? गहलोत द्वारा सत्ता सम्भालने के बाद वे अवाम और भाजपा को दरकिनार कर कोप भवन में जा बैठी और जब चुनाव आये और उन्हें राजस्थान में पार्टी की बागडोर सम्भलवाई गई तभी वे सक्रिय हुई! लेकिन पार्टी की बागडोर सम्भालने के बाद से आज तक भी उन्होंने यह नहीं बताया कि वे सत्ता में आने के बाद प्रदेश के अवाम के हित रक्षण हेतु क्या करेंगी? उनका गुड गवर्नेन्स का रोड़ मैप क्या होगा?
भाजपा की दूसरी बड़ी समस्या है, राज्य में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने से जुड़ा मसला। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा का एक धड़ा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के खिलाफ है। हालांकि इस धड़े में पूंजीपति और उनके पुछल्ले ही हैं, जबकि आम जैन समुदाय अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा प्राप्त करने के लिये संघर्षरत है। ऐसी स्थिति में अगर भाजपा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के मुद्दे पर अडंगे डालती है, तो उसके लिये यह घाटे का सौदा ही रहेगा।
भाजपा की अन्दरूनी कलह भी भाजपा को ले डूबने की स्थिति तक पहुंच गई है और चुनावों तक क्या स्थिति रहेगी, यह तो वक्त ही बतायेगा!
उधर कांग्रेस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अगुआई में अपने पिछले साढ़े चार साल की उपलब्धियों का बखान कर रही है! यात्राओं और सरकारी विज्ञापनों के जरिये जनता को बताया जा रहा है कि कांग्रेस की गहलोत सरकार ने उनके लिये क्या-क्या किया? लेकिन कांग्रेस पार्टी और सरकारी स्तर से कोई भी धरातलीय स्तर पर जाकर यह नहीं देख रहा है कि उनकी सरकारी योजनाओं से वास्तव में अवाम को क्या राहत या फायदा पहुंचा है? नतीजन अवाम धीरे-धीरे उनसे जुडऩे में कतराने लगा है। इसका खमियाजा कांग्रेस को उठाना ही पड़ेगा।
प्रदेश में जैन समुदाय की संख्या कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक हो सकती है! ऐसी स्थिति में अगर कांग्रेस पार्टी अपने वादे के अनुसार जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने में सफल रहती है तो जैन समुदाय का झुकाव निश्चित रूप से कांग्रेस की ओर बढ़ेगा और इसका फायदा कांग्रेस को निश्चित रूप से मिलेगा।
उधर मीडिया और चुनावी सर्वेकर्ता वामपंथी जनवादी दलों को नजरन्दाज कर रहे हैं। हालांकि उनकी भूमिका राज्य के इन विधानसभा चुनावों में इस बार महत्वपूर्ण रहने वाली है! लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि उन्होंने वामपंथी जनवादी दलों के 01 जुलाई, 2013 को हुए दिल्ली कन्वेशन को पूरी तरह राजस्थान में नकार दिया है और चार पार्टियों का जो तीसरा मोर्चा उन्होंने बनाया है उसमें अपने परम्परागत सहयोगियों को नजरन्दाज कर जनता दल सेक्युलर जैसे पार्टीयों को शामिल किया है। ज्ञातव्य रहे कि पिछले विधानसभा चुनावों में इस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष को जो वोट मिले थे उनकी गिनती सैंकडे की निचली पायदान पर थे। इससे माकपा को जमीनी स्तर पर नुकसान ही होगा। बसपा यथा स्थिति में है और उनके जीते हुए उम्मीदवारों का झुकाव भी कांग्रेस की तरफ ही रहेगा!
सांसद किरोड़लाल मीणा के मार्गदर्शन में खड़ी हुई एनपीपी राजस्थान में पहली बार चुनाव लड़ रही है और यह देखना है कि यह सिर्फ वोट काटू पार्टी साबित होती है या फिर अवाम में पैठ जमाती है। दोनों ही तरह से एनपीपी के उम्मीदवार भाजपाई उम्मीदवारों के वोटों में निश्चित रूप से सेंध मारेंगे, नतीजन नुकसान भाजपा को ही होगा! वहीं जनता दल यूनाइटेड को उनकी परम्परागत सीट मिलने की गुंजाइश है और सामाजवादी पार्टी सहित अन्य पार्टियां कांग्रेस या भाजपा के वोटों में सेंध मारने की परम्परा ही निभायेंगे।
कुल मिला कर यह तय ही लगता है कि राजस्थान में त्रिशंकु विधानसभा के आसार साफ-साफ नजर आ रहे हैं। इसमें जोड़-तोड़ की तिकड़म में जो पार्टी तेज पड़ेगी, सत्ता का ताज वहीं खैंच ले जायेगी। इसके साथ जो महत्वपूर्ण होगा वह यह कि वामजानवादी दल इस बार अपने वोट बैंक में अच्छा खासा इजाफा करेंगे।


