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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित अमरीकी/ब्रिटिश कस्टोडी में हुई मौत की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हो!

नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) अग्रगामी संदेश में हमने पिछले हफ्तों नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत/हत्या के सम्बन्ध में कुछ सवाल खड़े किये थे जिनके जवाब देने की केंद्र की यूपीएनीत कांग्रेस की अगुआई वाली डॉ.मनमोहन सिंह सरकार की अभी तक सोच ही नहीं बन पाई है!

आम अवाम में अब यह अहम चर्चा गहराई से होने लगी है कि ब्रिटेन और अमरीका ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को युद्ध अपराधी के रूप में अज्ञात स्थान पर नजरबंद रखा! जहां उन्हें नजरबंद रखा गया होगा, उनमें से एक क्यूबा द्वीप पर स्थित बदनाम अमरीकी अबू गरीब जेल का नाम आ रहा है, जहां देश के महान देशभक्त क्रान्तिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कैद रखा जा कर वाटर बोर्डिंग जैसी यातना देकर उन्हें शहीद कर दिया गया।

जस्टिस मुकर्जी कमीशन ने माना है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में हुई कथित हवाई जहाज दुर्घटना में नेताजी का देहान्त नहीं हुआ था। जवाहरलाल नेहरू के कान्फीडेंशियल स्टेनों श्यामलाल जैन की खोसला कमीशन को दिये गये बयान से भी साबित होता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा नेहरू को लिखे गये गोपनीय पत्र को नेहरू ने ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली को लीक कर दिया था और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एवं अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने सम्भवत: गिरफ्तार कर लिया था।

इस ही परिपेक्ष में ताजा खुलासा हुआ है जो जवाहरलाल नहरू से लेकर डॉ.मनमोहन सिंह की सरकारों एवं भाजपा की अटल बिहारी वाजपेई की सरकार की कलई खोल कर रख देते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रचूड घोष जो कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जीवनी लिख रहे हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना का अधिकार कानून 2005 के तहत सुभाष चंद्र बोस की पत्नी तथा पुत्री से जुडी जानकारियां मांगी थी। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह कहते हुए सूचना नहीं दी कि इस सूचना से सम्बन्धित फाइलें गोपनीय है और उनमें उल्लेखित जानकारियां उजागर होने से कुछ देशों से भारत के रिश्ते खराब हो सकते हैं!

प्रधानमंत्री कार्यालय के इस खुलासे से कि इस मामले की जानकारियां सार्वजनिक होने से कुछ देशों से रिश्ते खराब हो सकते हैं, से ही साबित हो जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अमरीका और ब्रिटेन ने मिलकर युद्ध बंदी के रूप में उन्हें गम्भीर यातनाऐं देकर उनकी हत्या कर दी! अगर ऐसा नहीं है तो फिर उनसे जुडी जानकारियों को सार्वजनिक करने में भारत के प्रधानमंत्री कार्यलय को क्यों ऐतराज है?

ज्ञातव्य रहे कि भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित 35 से अधिक गोपनीय फाइलें हैं जिनमें से तीन फाइलें अत्यन्त गोपनीय है और उनमें मौजूद दस्तावेज उजागर होने पर अमरीका, ब्रिटेन सहित अन्य देशों और भारत के कुछ राजनेताओं की कलई खोल कर रख देंगे। यही नहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित गोपनीय एवं अन्य दस्तावेज भारत के विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, केबीनेट सेके्रटरियट, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा गुप्तचर ब्यूरो (इंटेलीजेंस ब्यूरो) के पास भी उपलब्ध हैं। अगर इन सभी दस्तावेजों को इकठ्ठा कर विस्तृत पड़ताल की जाये तो महान देशभक्त क्रान्तिकारी सुभाष चंद्र बोस के हत्यारों की सारी शर्मनाक हकीकतें उजागर हो सकती है!

अब तक जो तथ्य सामने आये हें वे तथ्य ही यह उजागर कर रहे हैं कि 18 अगस्त, 1945 विमान हादसे में नेताजी का देहान्त नहीं हुआ था। यही नहीं यह सर्वविदित है कि 1955 तक, जब भारत को कथित रूप से गणतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया था तब भी अमरीकी खूफिया ऐजेंसी सीआईए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ भारत में सबूत जुटाती रही है! अब चूंकि भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी स्वीकारा है कि नेताजी से सम्बन्धित व्यक्तिगत जानकारियां उजागर करने से कुछ देशों से रिश्ते खराब हो सकते हैं। इस से भी साफ जाहिर होता है कि नेताजी की हत्या करने में अमरीका और ब्रिटेन का हाथ हो सकता है और ऐसी स्थिति में सारे मामले मी जांच भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के आधीन तीन न्यायाधीशों की कमेटी गठित कर उनकी निगरानी में नेशनल इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो से नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रकरण की विस्तार से जांच करवाई जाये और दोषियों की पहचान कर उन्हें दण्डित किया जाये।

 
AGRAGAMI SANDESH

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