पिछले रविवार को मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर के एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउण्ड स्थित प्रवचन पाण्डाल और नारायण सिंह सर्किल स्थित भट्टारक जी की नसियां में तमाशबीनों ने जो माहौल पैदा किया, जिस तरह प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों के साथ पेश आये क्या धार्मिक स्थानों पर ऐसी स्थितियां संतों के सानिध्य में होनी चाहिये? इस मुद्दे पर मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर को गम्भीरता से मंथन करना चाहिये! मुनि तरूण सागर अपने प्रवचनों में कभी श्रोताओं को श्मशान में रात बिताने के लिये कहते तो कभी उनकी टिप्पणी ज्योतिषियों के बारे में तो कभी किसी अन्य मुद्दे पर! मुनि जी भले ही इसे अपने कड़वे प्रवचन की संज्ञा दें, लेकिन आम लोगों और मनोवैज्ञानिक इसे उनका अहंकार या सनक से ज्यादा कुछ भी नहीं मानते हैं।
हमने पहिले भी कहा है कि यह कैसा सन्यास है? अगर हमारे इन संतों को अपना प्रचार, अपने अहं की तुष्टि, पाण्डालों और उनमें डेकोरेशनों की चमक-दमक, पूंजीपति हाजरियों की लालसा है और उनके बगैर वे अपने जीवन को अधूरा समझते हैं, तो छोडें सन्यास और बन जायें कथा वाचक।
खैर! प्रवचनभट्ट हमारे ये संत श्रद्धालुओं को जो कुछ पाठ पढ़ाते हैं, उनमें से 25 प्रतिशत का अमल अपने निजी जीवन में भी करें तो वे समाज और श्रद्धालुओं का अन्तहीन भला करने में सफल हो सकेंगे, अन्यथा फिर सन्यास का फायदा ही क्या?
हमने पहिले भी कहा है कि यह कैसा सन्यास है? अगर हमारे इन संतों को अपना प्रचार, अपने अहं की तुष्टि, पाण्डालों और उनमें डेकोरेशनों की चमक-दमक, पूंजीपति हाजरियों की लालसा है और उनके बगैर वे अपने जीवन को अधूरा समझते हैं, तो छोडें सन्यास और बन जायें कथा वाचक।
खैर! प्रवचनभट्ट हमारे ये संत श्रद्धालुओं को जो कुछ पाठ पढ़ाते हैं, उनमें से 25 प्रतिशत का अमल अपने निजी जीवन में भी करें तो वे समाज और श्रद्धालुओं का अन्तहीन भला करने में सफल हो सकेंगे, अन्यथा फिर सन्यास का फायदा ही क्या?




