ब्रिटिश सत्ताधीशों द्वारा 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में देश का विभाजन कर अंग्रेजों के ताबेदार काली चमड़ी वाले वर्तमान सत्ताधीशों को सत्ता सौंपी थी इस ट्रांसफर ऑफ पावर को जवाहरलाल नेहरू एण्ड कम्पनी ने देश के अवाम को बरगलाने के लिये आजादी की संज्ञा दी! मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू का अंग्रेजों के पिछलग्गू होने की हकीकत को बयां करते हैं ट्रांसफर ऑफ पावर के वे दस्तावेज जिन्हें भारत की यूपीएनीत कांग्रेस की डॉ.मनमोहन सिंह सरकार दबा कर बैठी है। यही नहीं अगस्त 1945 में जवाहरलाल नेहरू ने अपने कांफिडेंशियल स्टेनो श्यामलाल जैन से ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली के लिये एक पत्र-सीधे ही टाइपराइटर पर डिक्टेट करवाया गया था, जिसमें उन्होंने एटली को लिखा था कि आपके युद्ध अपराधी सुभाष चंद्र बोस को स्टालिन ने रूस की सीमा में प्रवेश की इजाजत दे दी है। श्यामलाल जैन ने ये तथ्य खोसला कमीशन के सामने गवाही देते हुए जाहिर किये थे और इसका सरकारी या गैर सरकारी किसी भी स्तर से आज तक कभी भी खण्डन नहीं किया गया।
इससे साफ जाहिर हो जाता है कि दरअसल भारत को किसी ने आजादी नहीं दिलवाई! नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आईएनए के बाहरी दबाव और लालसेना तथा फारवर्ड ब्लाक के जुझारू कार्यकर्ताओं के दबाव के कारण अंग्रेज देश को अपने पिछलग्गूओं को सत्ता हस्तांतरित कर देश से रवाना हो गये थे। इन अंग्रेजों के पिछलग्गूओं की नजर में महान देशभक्त क्रान्तिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस शायद अंग्रजों के युद्ध अपराधी हों, लेकिन वे हकीकत में राष्ट्रनायक हैं। शर्मनाक स्थिति यह है कि दक्षिणपंथी, अमरीका और ब्रिटेन की गुलामी की मानसिकता वाली केंद्र सरकार, 14-15 अगस्त, 1947 की रात में हस्ताक्षरित ट्रांसफर ऑफ पावर के दस्तावेज अवाम को जाहिर कर दे तो हकीकत में देश में एक नई क्रान्ति का आगाज हो जायेगा। इस ही डर से इन दस्तावेजों को उजागर नहीं किया जा रहा है!
यही कारण है कि देश को अमरीका और ब्रिटेन के गुलामों वाली मानसिकता से देश का शासन चलाया जा रहा है। गत 14 अगस्त, 2013 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के राष्ट्र के नाम सम्बोधन ने इस हकीकत को अप्रत्यक्ष रूप से उजागर कर दिया। लेकिन 15 अगस्त, 2013 को देशभर में आजादी के नाम पर गलाफाड़ कर भाषण झाडऩे वालों ने एक शब्द भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लालसेना और फारवर्ड ब्लाक के जुझारू क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं के बारे में नहीं बोला! क्योंकि हकीकत ट्रांसफर ऑफ पावर के दस्तावेजों में अटक कर रह गई है। जरूरत है इन दस्तावेजों को अवाम के आगे जगजाहिर करने की! ताकि अवाम कांग्रेस की हकीकत से रूबरू हो सके।
इससे साफ जाहिर हो जाता है कि दरअसल भारत को किसी ने आजादी नहीं दिलवाई! नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आईएनए के बाहरी दबाव और लालसेना तथा फारवर्ड ब्लाक के जुझारू कार्यकर्ताओं के दबाव के कारण अंग्रेज देश को अपने पिछलग्गूओं को सत्ता हस्तांतरित कर देश से रवाना हो गये थे। इन अंग्रेजों के पिछलग्गूओं की नजर में महान देशभक्त क्रान्तिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस शायद अंग्रजों के युद्ध अपराधी हों, लेकिन वे हकीकत में राष्ट्रनायक हैं। शर्मनाक स्थिति यह है कि दक्षिणपंथी, अमरीका और ब्रिटेन की गुलामी की मानसिकता वाली केंद्र सरकार, 14-15 अगस्त, 1947 की रात में हस्ताक्षरित ट्रांसफर ऑफ पावर के दस्तावेज अवाम को जाहिर कर दे तो हकीकत में देश में एक नई क्रान्ति का आगाज हो जायेगा। इस ही डर से इन दस्तावेजों को उजागर नहीं किया जा रहा है!
यही कारण है कि देश को अमरीका और ब्रिटेन के गुलामों वाली मानसिकता से देश का शासन चलाया जा रहा है। गत 14 अगस्त, 2013 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के राष्ट्र के नाम सम्बोधन ने इस हकीकत को अप्रत्यक्ष रूप से उजागर कर दिया। लेकिन 15 अगस्त, 2013 को देशभर में आजादी के नाम पर गलाफाड़ कर भाषण झाडऩे वालों ने एक शब्द भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लालसेना और फारवर्ड ब्लाक के जुझारू क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं के बारे में नहीं बोला! क्योंकि हकीकत ट्रांसफर ऑफ पावर के दस्तावेजों में अटक कर रह गई है। जरूरत है इन दस्तावेजों को अवाम के आगे जगजाहिर करने की! ताकि अवाम कांग्रेस की हकीकत से रूबरू हो सके।


