देश में कुल कितने साधु-सन्यासी और उनकी आड़ में अपनी दुकानदारी चलाने वाले कथावाचकों की तादाद आखीर कितनी है? यह कोई नहीं जानता है! चौंकाने वाली स्थिति यह है कि साधु-संतों की आड़ में सड़क का आम भिखारी भी अपने आप को साधु बताता है। हकीकत में साधु-संतों के बारे में, उनकी तादाद के बारे में सच्चाई कोई भी नहीं जानता है। गांव, कस्बों यहां तक की शहरों में भी टोने-टोटके करने वाले भी साधु-संतों का भेष धारण कर अवाम की आस्था को ठेस पहुंचा कर उन्हें लूटते रहते हैं और यह क्रम आज भी निरन्तर चल रहा है।
कुछ दिन पहिले मेरे दफ्तर में एक साधु भेषधारी युवक जबरन घुस आया और अपनी मांग पूरी करने के लिये दबाव डालने लगा! उसे मना करने और बाहर जाने के लिये कहने पर अकड़ गया और कहने लगा कि मैं नागाबाबा हूं! और तुम्हें मेरी मांग पूरी करनी ही पड़ेगी। हमने उसकी मांग पूरी करने की बजाय नागा साधुओं की परम्परा के मुद्दे पर सवाल पूछने शुरू कर दिये तो जनाब भाग छूटे।
इस ही तरह देश के हर गांव-कस्बे-शहर में ऐसे सैंकड़ों -हजारों लोग हैं, जो साधु-संतों की आड़ में भिक्षावृति करते हैं! इनमें से काफी तादाद में जरायमपेशा लोग भी होते हैं जो साधु-संतों की तरह भेष बना कर घर-घर जा कर भिक्षा की आड़ में रेकी कर चोरी-डकैती को अन्जाम देते हैं।
ऐसे साधु-संत भी हैं जो किसी समाज से ऊपरी तौर पर तो जुड़े होते हैं, लेकिन सन्यास लेने के बाद भी मोह-माया से उन्हें छुटकारा नहीं मिलता है। वे कथावाचकों की तरह अपना एक आश्रम या फिर पैसा बटेरू कोई संस्था बना लेते हैं। ऐसे सन्त-साधु अपने आगे ऐसी डिग्रियां लगा लेते हैं जो उन्हें किसी ने नहीं दी। जैसे कि राष्ट्र संत वगैहरा-वगैहरा! और अपने किसी विश्वस्त या फिर परिजन या रिश्तेदार को अपने आश्रम या संस्थान का मुखिया बना कर उनकी आड़ में करते हैं करोड़ों के वारे न्यारे!
सरकार देश की आबादी की जनगणना करवाती है, काम-धंधों का सर्वोक्षण करवाती है। हाल ही में देश में जाति आधारित गणना भी हुई है। सरकार पशु गणना भी करवाती है, ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को साधु, संतों, बाबाओं, कथावाचकों, पुजारियों, भिखारियों की भी गणना करवानी चाहिये।
अगर सरकार साधु, संतों-सन्यासियों, बाबाओं, कथावाचकों, भिखारियों की गणना और इनके द्वारा अर्जित धन, सम्पत्ति की गणना करवाये तो कई गम्भीर और रोचक तथ्य सामने आयेंगे। जो देश की अखण्डता-एकता, देश में बढते ही जा रहे अपराध, बलात्कार, भ्रूण हत्या जैसे अपराधों के पीछे के राज खोलेंगे।
यही नहीं इन साधु, संतों, सन्यासियों, बाबाओं, कथावाचकों, धर्म के मठाधीशों द्वारा अर्जित धन जिसमें ज्यादातर कालाधन होता है, उसकी और कालेधन के स्त्रोतों की हकीकत भी उजागर होगी!
सरकार को चाहिये कि अनियन्त्रित, अनुशासनहीन साधु-सन्यासियों, बाबाओं, मठाधीशों को नियन्त्रित करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर इनकी गणना होकर इनका पंजिकरण किया जाये। क्योंकि इन साधु, सन्यासियों, बाबाओं, मठाधीशों, कथावाचकों और धर्म के कथित ठेकेदारों पर सामाजिक स्तर पर कोई स्पष्ट नियन्त्रण नहीं है और सभी अपनी-अपनी डपली अपना-अपना राग गाते रहते हैं। समस्या यह भी है कि अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि इनमें से कौन संत-साधु, सन्यासी है और कौन कथावाचक, भिखारी है? कौन समाज के अनुशासन में है और कौन उद्ण्ड अनुशासनहीन! किसका किस समाज से सम्बन्ध है? और कौन अपनी कमाई की दुकान चलाता है।
अब सन्यास आश्रम की आड़ में अनियन्त्रित लोगों की भीड़ को नियन्त्रित करने का वक्त आ गया है। अन्यथा यह समस्या नासूर बनने की कागार पर पहुंचती जा रही है, जिसके आने वाले वक्त में गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
कुछ दिन पहिले मेरे दफ्तर में एक साधु भेषधारी युवक जबरन घुस आया और अपनी मांग पूरी करने के लिये दबाव डालने लगा! उसे मना करने और बाहर जाने के लिये कहने पर अकड़ गया और कहने लगा कि मैं नागाबाबा हूं! और तुम्हें मेरी मांग पूरी करनी ही पड़ेगी। हमने उसकी मांग पूरी करने की बजाय नागा साधुओं की परम्परा के मुद्दे पर सवाल पूछने शुरू कर दिये तो जनाब भाग छूटे।
इस ही तरह देश के हर गांव-कस्बे-शहर में ऐसे सैंकड़ों -हजारों लोग हैं, जो साधु-संतों की आड़ में भिक्षावृति करते हैं! इनमें से काफी तादाद में जरायमपेशा लोग भी होते हैं जो साधु-संतों की तरह भेष बना कर घर-घर जा कर भिक्षा की आड़ में रेकी कर चोरी-डकैती को अन्जाम देते हैं।
ऐसे साधु-संत भी हैं जो किसी समाज से ऊपरी तौर पर तो जुड़े होते हैं, लेकिन सन्यास लेने के बाद भी मोह-माया से उन्हें छुटकारा नहीं मिलता है। वे कथावाचकों की तरह अपना एक आश्रम या फिर पैसा बटेरू कोई संस्था बना लेते हैं। ऐसे सन्त-साधु अपने आगे ऐसी डिग्रियां लगा लेते हैं जो उन्हें किसी ने नहीं दी। जैसे कि राष्ट्र संत वगैहरा-वगैहरा! और अपने किसी विश्वस्त या फिर परिजन या रिश्तेदार को अपने आश्रम या संस्थान का मुखिया बना कर उनकी आड़ में करते हैं करोड़ों के वारे न्यारे!
सरकार देश की आबादी की जनगणना करवाती है, काम-धंधों का सर्वोक्षण करवाती है। हाल ही में देश में जाति आधारित गणना भी हुई है। सरकार पशु गणना भी करवाती है, ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को साधु, संतों, बाबाओं, कथावाचकों, पुजारियों, भिखारियों की भी गणना करवानी चाहिये।
अगर सरकार साधु, संतों-सन्यासियों, बाबाओं, कथावाचकों, भिखारियों की गणना और इनके द्वारा अर्जित धन, सम्पत्ति की गणना करवाये तो कई गम्भीर और रोचक तथ्य सामने आयेंगे। जो देश की अखण्डता-एकता, देश में बढते ही जा रहे अपराध, बलात्कार, भ्रूण हत्या जैसे अपराधों के पीछे के राज खोलेंगे।
यही नहीं इन साधु, संतों, सन्यासियों, बाबाओं, कथावाचकों, धर्म के मठाधीशों द्वारा अर्जित धन जिसमें ज्यादातर कालाधन होता है, उसकी और कालेधन के स्त्रोतों की हकीकत भी उजागर होगी!
सरकार को चाहिये कि अनियन्त्रित, अनुशासनहीन साधु-सन्यासियों, बाबाओं, मठाधीशों को नियन्त्रित करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर इनकी गणना होकर इनका पंजिकरण किया जाये। क्योंकि इन साधु, सन्यासियों, बाबाओं, मठाधीशों, कथावाचकों और धर्म के कथित ठेकेदारों पर सामाजिक स्तर पर कोई स्पष्ट नियन्त्रण नहीं है और सभी अपनी-अपनी डपली अपना-अपना राग गाते रहते हैं। समस्या यह भी है कि अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि इनमें से कौन संत-साधु, सन्यासी है और कौन कथावाचक, भिखारी है? कौन समाज के अनुशासन में है और कौन उद्ण्ड अनुशासनहीन! किसका किस समाज से सम्बन्ध है? और कौन अपनी कमाई की दुकान चलाता है।
अब सन्यास आश्रम की आड़ में अनियन्त्रित लोगों की भीड़ को नियन्त्रित करने का वक्त आ गया है। अन्यथा यह समस्या नासूर बनने की कागार पर पहुंचती जा रही है, जिसके आने वाले वक्त में गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।


