जयपुर/धौलपुर (अग्रगामी) भारतीय जनता पार्टी में पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे का वनमैन सामन्तवादी वर्चस्व अब सामने आने लगा है। राजे ने गत 22 अगस्त से आगामी 02 सितम्बर, 2013 तक धौलपुर में अपने राजमहल में बैठ कर प्रदेश में संगठन को मजबूत करने, उम्मीदवारी का फीडबैक लेने और पार्टी में गुटबाजी कम करने और आगामी 10 सितम्बर को जयपुर में होने वाले सुराज संकल्प सम्मेलन की तैयारी से सम्बन्धित फीडबैक लेना जारी कर रखा है। इस दौरान प्रदेश के हर जिले के पदाधिकारी उनके धौलपुर स्थित महल में पहुंच कर उन्हें अपने जिले का फीडबैक दे रहे हैं। हालांकि यह काम जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय पर होना चाहिये था! जहां इस काम में प्रदेश के शीर्ष नेता भी उन्हें सहयोग कर सकते थे, या फिर उनसे सहयोग लिया जा सकता था! लेकिन प्रादेशिक नेताओं को दरकिनार कर उन्होंने फीडबैक लेने का काम अपने धौलपुर राजमहल में बैठ कर अकेले ही करने का जो फैसला लिया है वह पार्टी में गुटबाजी को बढावा देने का ही काम करेगा और अन्तत: इससे भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश में फायदे की जगह नुकसान ही ज्यादा होने की आशंका है।
विधानसभा चुनावों से पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में सुराज संकल्प यात्रा सहित अन्य जो भी गतिविधियां चलाई जा रही है, उनमें से अधिकांश गतिविधियों में प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कोई ज्यादा रोल नहीं है और पार्टी के अन्दर वसुन्धरा राजे बनाम अन्य (पार्टी नेताओं) के बीच जो खाई बनी है, वह ओर भी गहरी होती जा रही है!
चूंकि श्रीमती वसुन्धरा राजे को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पहिले जो फैसले शीर्ष भाजपा नेतृत्व ने लिये उनका विरोध तो प्रादेशिक स्तर पर होने की स्थितियां नहीं है, लेकिन भितरघात से कोई इन्कार नहीं कर सकता है। अगर श्रीमती वसुन्धरा राजे ने पार्टी टिकट बंटवारे में सामन्तवाद का परिचय दिया तो भितरघात होना निश्चित रूप से तैय है।
लेकिन एक बात तैय है कि अगर भाजपा में प्रादेशिक स्तर पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गुटबाजी फैली तो यह साफ है कि राजस्थान में सत्ता प्राप्ति उनके लिये मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से ज्यादा कुछ नहीं होगा!
विधानसभा चुनावों से पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में सुराज संकल्प यात्रा सहित अन्य जो भी गतिविधियां चलाई जा रही है, उनमें से अधिकांश गतिविधियों में प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कोई ज्यादा रोल नहीं है और पार्टी के अन्दर वसुन्धरा राजे बनाम अन्य (पार्टी नेताओं) के बीच जो खाई बनी है, वह ओर भी गहरी होती जा रही है!
चूंकि श्रीमती वसुन्धरा राजे को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पहिले जो फैसले शीर्ष भाजपा नेतृत्व ने लिये उनका विरोध तो प्रादेशिक स्तर पर होने की स्थितियां नहीं है, लेकिन भितरघात से कोई इन्कार नहीं कर सकता है। अगर श्रीमती वसुन्धरा राजे ने पार्टी टिकट बंटवारे में सामन्तवाद का परिचय दिया तो भितरघात होना निश्चित रूप से तैय है।
लेकिन एक बात तैय है कि अगर भाजपा में प्रादेशिक स्तर पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गुटबाजी फैली तो यह साफ है कि राजस्थान में सत्ता प्राप्ति उनके लिये मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से ज्यादा कुछ नहीं होगा!


