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जैन समाज की एकता के दावों की निकली हवा!-4

जयपुर (अग्रगामी) श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता के पाखण्ड का जिस तरह विज्ञापनों के जरिये ढिंढोरा पीटा गया था वह अब ठण्डा पड़ता जा रहा है। हालात ये हो गये हैं कि मुनि तरूण सागर जयपुर चातुर्मास आयोजन समिति से जुड़े सेठों और उनके पिछलग्गुओं को आयोजन स्थल पर भीड़ जुटाने के लिये बसों की खेपें बढ़ानी पड़ रही है। ताकि मुफ्त में जाने-आने का प्रलोभन देकर एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउण्ड स्थित आयोजन स्थल पर किसी भी तरह भीड़ जुटाई जा सके। लेकिन अपेक्षित भीड़ जुट नहीं पा रही है।

पिछले दिनों गुलाब कोठारी का संतों-सन्यासियों के गहन चिंतन मनन योग्य अग्रलेख सार्थक बने चातुर्मास राजस्थान पत्रिका में छपा था। अब क्षुल्लक अतुल्य सागर ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कथन है कि आज सन्यास या कहें वानप्रस्थ आश्रम भी आधुनिकता की चकाचौंध का शिकार है। हालांकि इस लोकप्रियता की होड़ में भी कुछ संत वास्तविक साधना के साथ समाज को सही दिशा देने का कार्य गोपनीयता के साथ कर रहे हैं, पर इनकी संख्या कम है, बाकी सब विशाल पांडालों में मीडियाकर्मियों को भीड़ के बीच अमीर और सम्पन्न कथित भक्तों की राजनीतिक चकाचौंध को ही पोषित कर रहे हैं। समाज के पुर्ननिर्माण का संकल्प संजोए समाज के युवाओं को धर्म और संस्कृति से जोडऩे का प्रयास कर रहे हैं जिसमें युवाओं को धर्म और संस्कारों के महत्व से रूबरू करवाते हैं। वे आगे कहते हैं कि साधु अपने कर्तव्य और उत्तरदायीत्व को समाजहित में पूर्ण कर चातुर्मास को सार्थक बनाये। गुलाब कोठारी, क्षुल्लक अतुल्य सागर का कथन सटीक है, लेकिन प्रवचनभट्ट संतों, साधुओं को शायद ये रास न आये! उधर दिगम्बर समाज के श्रावक प्रेमचंद जैन का कहना है कि दिगम्बर परम्परा में ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, मुनि, उपाध्याय और आचार्य पद होते हैं। दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्परा में कहीं भी राष्ट्र संत शब्द का उल्लेख नहीं होता है। फिर एक ही पंडाल में तीन-तीन राष्ट्र संतों का जमावड़ा कहां से हो गया? उनका एक अहम सवाल यह भी है कि तीर्थंकर महावीर साधु-साध्वियों के समूह (श्री संघ) के साथ चलते थे। जबकि तरूण सागर अकेले भ्रमण करते हैं। आखीर क्यों? उन्होंने सवाल किया कि मुनि तरूण सागर ने अपने जयपुर प्रवास में भीड़ जुटाने के लिये दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता के पाखण्ड का भरपूर प्रचार करवाया, लेकिन आज तक दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता पर अपने प्रवचनों में एक शब्द भी नहीं बोला! आखीर क्यों?

वहीं दिगम्बर मुनि पुलक सागर का भी कहना है कि चातुर्मास समाज का होता है, संतों का नहीं! महोपाध्याय ललितप्रभ सागर का भी कहना है कि इस चातुर्मास में वे समाज को व्यसन एवं भेदभाव मुक्त करवायेंगे! क्या यह पांडाल में भीड़ जुटा कर कड़वे-मीठे प्रवचन देकर किया जा सकता है या फिर  समाज के बीच रह कर उसमें व्याप्त कमियों को तलाश कर उन्हें दूर किया जा सकता है!
दु:खद स्थिति यह है कि खुद संत ही पांडाल में प्रवचन के लोभ लालच के चलते समाज से दूर होते चले जा रहे हैं! उदाहरण के रूप में श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के धर्म स्थल विचक्षण भवन और शिवजीराम भवन में संतों की गैर मौजूदगी में वीरानगी पसरी है। श्वेताम्बर परम्परा में प्रवचनों के दौरान जो श्रावक-श्राविका समवक्य (समाई) धारणा के साथ बैठते हैं, उनका वह क्रम टूट गया है, क्योंकि एसएमएस स्टेडियम में वे अपनी इस क्रिया को पारित नहीं कर सकते हैं। दैनिक समवक्य (समाई) और प्रतिक्रमण की क्रिया पर भी लगभग विराम सा लग गया है और इस हेतु भी श्रावक-श्राविकाओं को अन्यन्त्र जाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। जयपुर के समग्र ओसवाल समाज और खास कर खरतरगच्छ समुदाय के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि समाज के चातुर्मास के इस पावन आयोजन के दौरान खरतरगच्छ के धर्म स्थलों में सन्नाटा पसरा है। वहीं दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता का ढिंढोरा एक पाखण्ड बन कर उभरा है और हमारा यह कथन सही साबित हो रहा है कि श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड मात्र आयोजकों ने पांडाल में भीड़ जुटाने मात्र के लिये ही किया है।

जैन समुदाय से जुडे सूत्र सवाल उठाते हैं कि अपने पांडाल में भीड़ जुटाने के लिये संत अपने समाज की धार्मिक-सामाजिक परम्पराओं को दरकिनार कर और सामज की स्थापित मर्यादाओं की अनदेखी कर रहे हैं और संत अगर अपनी वाहवाही, प्रचार और खुद के अहम की तुष्टि के रास्ते चलते हैं तो क्या उनका चातुर्मास प्रवास सार्थक होगा? इस पर संतों को गम्भीरतापूर्वक चिंतन करना होगा।
संतों को यह भी मंथन करना होगा कि प्रवचन वे ही विद्वान दे सकते हैं, जो अपने कथनों का पहिले स्वंय पालन करते हों और उनके कथन-प्रवचन उनके जीवन में सार्थक उतरे हों। अन्यथा मात्र प्रवचन देने से समाज का भला होना नामुमकीन है!

 
AGRAGAMI SANDESH

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AGEAGAMI SANDESH

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