गत शनिवार को उदयपुर के जिला पुलिस अधीक्षक के कार्यालय परिसर में शूटिंग के दौरान खुद पुलिस अधीक्षक को ही दफ्तर में जाने से रोकने के मामले में पूजा भट्ट और पुलिस अधीक्षक हरिप्रसाद शर्मा के मध्य हुए विवाद को जिस तरह सुलझाया गया वह पुलिस के मनोबल को तोडऩे वाला है!
यहां पहिला सवाल है कि क्या उदयपुर कलक्ट्रेट में फिल्म 'बेडÓ की शूटिंग की इजाजत दी गई थी? यदि दी गई थी तो किसने और किन नियमों के तहत दी?
दूसरा सवाल उठता है कि जिस भी अधिकारी ने शूटिंग के लिये लिखित या मौखिक रूप से शूटिंग की स्वीकृति दी, उसने सरकारी कामकाज के दिन शूटिंग की इजाजत किन नियमों के तहत और क्यों दी?
तीसरा सवाल है कि जिस किसी अफसर ने इजाजत दी, उसने इसकी जानकारी पुलिस अधीक्षक को क्यों नहीं दी? वहीं पुलिस अधीक्षक कार्यालय परिसर में शूटिंग की इजाजत बिना पुलिस अधीक्षक की स्पष्ट स्वीकृति के कैसे दे दी?
चौथा सवाल है कि जिस भी अफसर ने फिल्म की शूटिंग के लिये लिखित या मौखिक इजाजत दी, उसके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की गई? और क्यों पुलिस अधीक्षक पर दबाव डाल कर मामला रफा-दफा करने और पुन: फिल्म शूटिंग करने की छूट दी गई!
राज्य के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि राजस्थान प्रदेश किसी राजनेता या फिल्मी कलाकार की घर की जागीर नहीं है! राज्य में प्रजातांत्रिक चुनिन्दा सरकार है और उसे संवैधानिक तरीके से ही काम करना चाहिये और करना होगा। इस प्रकरण में जिस तरह का राजनैतिक दबाव एवं प्रशासनिक दब्बूपन दिखाया गया वह निन्दनीय है। इससे राज्य के पुलिस बेडे का मनोबल टूटेगा।
एक बात ओर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को समझ लेनी चाहिये कि दुबारा सत्ता पर काबिज होने के लिये उन्हें जनता के वोटों की जरूरत पड़ेगी। दिल्ली के कोई राजनेता या एक्टर-एक्ट्रेस के वोटों से वे राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज नहीं हो सकते हैं! वहीं राजनेताओं को भी साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि राज्य की कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को नियन्त्रित करने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले पुलिस बेडे के मनोबल को तोडऩे की अपनी हरकतों पर अंकुश लगायें। क्योंकि हीन भावना से ग्रस्त पुलिसकर्मियों की झल्लाहट आखीरकार गरीबों पर टूटती है और इससे जनआक्रोश बढ़ता है। नतीजन आम अवाम में सरकार और सत्ताधीशों की छवि सिर्फ बिगड़ती ही नहीं है, उन्हें अवाम के आक्रोश केचलते सत्ता के गलियारे से बाहर भी होना पड़ सकता है!
यहां पहिला सवाल है कि क्या उदयपुर कलक्ट्रेट में फिल्म 'बेडÓ की शूटिंग की इजाजत दी गई थी? यदि दी गई थी तो किसने और किन नियमों के तहत दी?
दूसरा सवाल उठता है कि जिस भी अधिकारी ने शूटिंग के लिये लिखित या मौखिक रूप से शूटिंग की स्वीकृति दी, उसने सरकारी कामकाज के दिन शूटिंग की इजाजत किन नियमों के तहत और क्यों दी?
तीसरा सवाल है कि जिस किसी अफसर ने इजाजत दी, उसने इसकी जानकारी पुलिस अधीक्षक को क्यों नहीं दी? वहीं पुलिस अधीक्षक कार्यालय परिसर में शूटिंग की इजाजत बिना पुलिस अधीक्षक की स्पष्ट स्वीकृति के कैसे दे दी?
चौथा सवाल है कि जिस भी अफसर ने फिल्म की शूटिंग के लिये लिखित या मौखिक इजाजत दी, उसके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की गई? और क्यों पुलिस अधीक्षक पर दबाव डाल कर मामला रफा-दफा करने और पुन: फिल्म शूटिंग करने की छूट दी गई!
राज्य के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि राजस्थान प्रदेश किसी राजनेता या फिल्मी कलाकार की घर की जागीर नहीं है! राज्य में प्रजातांत्रिक चुनिन्दा सरकार है और उसे संवैधानिक तरीके से ही काम करना चाहिये और करना होगा। इस प्रकरण में जिस तरह का राजनैतिक दबाव एवं प्रशासनिक दब्बूपन दिखाया गया वह निन्दनीय है। इससे राज्य के पुलिस बेडे का मनोबल टूटेगा।
एक बात ओर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को समझ लेनी चाहिये कि दुबारा सत्ता पर काबिज होने के लिये उन्हें जनता के वोटों की जरूरत पड़ेगी। दिल्ली के कोई राजनेता या एक्टर-एक्ट्रेस के वोटों से वे राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज नहीं हो सकते हैं! वहीं राजनेताओं को भी साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि राज्य की कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को नियन्त्रित करने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले पुलिस बेडे के मनोबल को तोडऩे की अपनी हरकतों पर अंकुश लगायें। क्योंकि हीन भावना से ग्रस्त पुलिसकर्मियों की झल्लाहट आखीरकार गरीबों पर टूटती है और इससे जनआक्रोश बढ़ता है। नतीजन आम अवाम में सरकार और सत्ताधीशों की छवि सिर्फ बिगड़ती ही नहीं है, उन्हें अवाम के आक्रोश केचलते सत्ता के गलियारे से बाहर भी होना पड़ सकता है!


