क्रिकेट भारत का परम्परागत खेल नहीं है और यह खेल कालेधन और सट्टेबाजियों की पनाहगाह बनता जा रहा है। अत: इस पर भारत में पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाये। रूस, अमरीका, चीन, फ्रांस और जर्मनी सहित विश्व के अधिकांश देशों में क्रिकेट नहीं खेला जाता है। क्रिकेट केवल चंद देशों में प्रचलित है। जो अंग्रेजों की दासता से मुक्त होकर स्वतंत्र देश बने हैं।
भारत में क्रिकेट पर प्रतिबंध लगाने का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है कि इसके कारण देश के अन्य खेलों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। तीसरा कारण है कि इस खेल के कारण देश में परोक्ष रूप से सट्टेबाजी को प्रोत्साहन मिल रहा है तथा चौथा कारण है कि इस खेल के माध्यम से कालेधन का उपयोग बेरोकटोक हो रहा है।
क्रिकेट भारत में वैसे भी कोई परम्परागत खेल नहीं रहा है। देश के पिछले तीन हजार साल का इतिहास निकालें तो उसमें क्रिकेट खेल का कोई अतापता नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में जबकि हमने गुलामी की जंजीरें तोड़कर भारत गणतंत्र की स्थापना की है तो फिर भारत से क्रिकेट को अलविदा क्यों नहीं कहा जा सकता है?
जब तक भारत में क्रिकेट पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है, तब तक बीसीसीआई के वास्तविक लाभ का कम से कम 76 प्रतिशत अन्य खेलों में खपाया जाना चाहिये और इण्डियन प्रीमियर लीग पर तो पूर्णत: प्रतिबंध लगा ही देना चाहिये।
वैसे भी आईपीएल के कमिश्रर रहे ललित मोदी सहित नामीगिरामी राजनीतिज्ञ और पूंजीपति क्रिकेट को माध्यम बनाकर हो रहे सट्टेबाजी और कालेधन को खपाने की हरकतों के कारण बदनाम हो गये हैं। ऐसी स्थिति में भी देश की राजनैतिक जमात को स्वच्छ छवि प्रदान करेन के लिये भी क्रिकेट पर प्रतिबंध नहीं लगता है तब तक सभी राजनैतिक दलों के नेताओं और सदस्यों को जोकि खिलाड़ी नहीं रहे हैं, उन्हें क्रिकेट से जुड़ी संस्थाओं से बाहर निकाल फेंक देना चाहिये ताकि इस खेल की छवि सुधर सके।
क्रिकेट के कारण पिछले दिनों देश में क्षणिक राजनैतिक भूचाल भी आया और कुछ राजनेताओं की हरकतें भी सामने आई। जोकि भारत गणतंत्र के स्वाभिमान के लिये उचित नहीं कही जा सकती।
भारत गणतंत्र में अवाम को मुख्य समस्यायें हैं गरीबी, मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से मुक्ति, जमाखोरों-कालाबाजारियों से निजात पाना और देश में कानून राज्य स्थापित करना। हमारे राजनेताओं को अब क्रिकेट की तरफ ध्यान देना छोड़कर इन समस्याओं की ओर ध्यान देना चाहिये। क्योंकि राजनैतिक दलों और राजनेताओं की जिम्मेदारी है कि वे देश और देश की समस्याओं पर ध्यान दें। खासकर वे राजनेता जिन्हें जनता अपना प्रतिनिधी (जनप्रतिनिधी) चुनकर संवैधानिक संस्थाओं में भेजती है।
उम्मीद की जानी चाहिये कि राजनेता खासकर चुनिंदा जनप्रतिनिधी अपने देश और जनता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने में सक्षमता से कार्य करेंगे।
भारत में क्रिकेट पर प्रतिबंध लगाने का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है कि इसके कारण देश के अन्य खेलों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। तीसरा कारण है कि इस खेल के कारण देश में परोक्ष रूप से सट्टेबाजी को प्रोत्साहन मिल रहा है तथा चौथा कारण है कि इस खेल के माध्यम से कालेधन का उपयोग बेरोकटोक हो रहा है।
क्रिकेट भारत में वैसे भी कोई परम्परागत खेल नहीं रहा है। देश के पिछले तीन हजार साल का इतिहास निकालें तो उसमें क्रिकेट खेल का कोई अतापता नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में जबकि हमने गुलामी की जंजीरें तोड़कर भारत गणतंत्र की स्थापना की है तो फिर भारत से क्रिकेट को अलविदा क्यों नहीं कहा जा सकता है?
जब तक भारत में क्रिकेट पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है, तब तक बीसीसीआई के वास्तविक लाभ का कम से कम 76 प्रतिशत अन्य खेलों में खपाया जाना चाहिये और इण्डियन प्रीमियर लीग पर तो पूर्णत: प्रतिबंध लगा ही देना चाहिये।
वैसे भी आईपीएल के कमिश्रर रहे ललित मोदी सहित नामीगिरामी राजनीतिज्ञ और पूंजीपति क्रिकेट को माध्यम बनाकर हो रहे सट्टेबाजी और कालेधन को खपाने की हरकतों के कारण बदनाम हो गये हैं। ऐसी स्थिति में भी देश की राजनैतिक जमात को स्वच्छ छवि प्रदान करेन के लिये भी क्रिकेट पर प्रतिबंध नहीं लगता है तब तक सभी राजनैतिक दलों के नेताओं और सदस्यों को जोकि खिलाड़ी नहीं रहे हैं, उन्हें क्रिकेट से जुड़ी संस्थाओं से बाहर निकाल फेंक देना चाहिये ताकि इस खेल की छवि सुधर सके।
क्रिकेट के कारण पिछले दिनों देश में क्षणिक राजनैतिक भूचाल भी आया और कुछ राजनेताओं की हरकतें भी सामने आई। जोकि भारत गणतंत्र के स्वाभिमान के लिये उचित नहीं कही जा सकती।
भारत गणतंत्र में अवाम को मुख्य समस्यायें हैं गरीबी, मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से मुक्ति, जमाखोरों-कालाबाजारियों से निजात पाना और देश में कानून राज्य स्थापित करना। हमारे राजनेताओं को अब क्रिकेट की तरफ ध्यान देना छोड़कर इन समस्याओं की ओर ध्यान देना चाहिये। क्योंकि राजनैतिक दलों और राजनेताओं की जिम्मेदारी है कि वे देश और देश की समस्याओं पर ध्यान दें। खासकर वे राजनेता जिन्हें जनता अपना प्रतिनिधी (जनप्रतिनिधी) चुनकर संवैधानिक संस्थाओं में भेजती है।
उम्मीद की जानी चाहिये कि राजनेता खासकर चुनिंदा जनप्रतिनिधी अपने देश और जनता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने में सक्षमता से कार्य करेंगे।


