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जैन समुदाय के समाजबंधु चातुर्मास का महत्व समझें और उसका अनुसरण करें!

अल्पसंख्यक जैन समुदाय में आगामी 31 जुलाई, 2015 से चातुर्मास प्रारंभ हो जायेंगे। इन चार महिनों में जैन समुदाय के समाजबंधुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संयमित जीवन बितायें। प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज ऐसा कोई कृत्य नहीं करते थे जिससे कि चातुर्मास के दौरान किसी भी प्राणी को किसी भी तरह का कोई भी कष्ट हो। साथ ही वे उनके द्वारा किये गये गलत कार्यों या गल्तियों के लिये संवत्सरी के दिन सच्चे दिल से क्षमायाचना करते थे। उनके कृत्यों में कोई दिखावा नहीं होता था और वे सच्चे हृदय से अपनी गलतियों का प्रायश्चित करते थे। जबकि वर्तमान में अल्पसंख्यक जैन समाजबंधु दिखावे की क्षमायाचना करते हैं। जोकि अनुचित है!
वर्तमान समय में अल्पसंख्यक जैन समुदाय के ज्यादातर समाजबंधु अपनी पिछले समय के अपराधों एवं गलतियों के लिये वास्तव में हृदय से कोई क्षमायाचना नहीं करते सिर्फ प्रतिक्रमण के बाद खमाऊं छूं-खमाऊं छूं कह कर अपने दायित्व को पूरा समझते हैं और अपनी जबान से खमाऊं छूं-खमाऊं छूं के के तुरन्त बाद से ही कुटिलता और अपने ही लोगों को परेशान करने की चालों को शुरू कर देते हैं। उनके लिये संवत्सरी, प्रतिक्रमण के बाद की गई क्षमायाचना एक आडम्बर से ज्यादा कुछ नहीं होती है। कुछ धनपतियों के लिये तो चातुर्मास में पर्युषण पर्व उनकी दौलत के दिखावे का शायद पहला और अंतिम मौका होता है। वे धर्म की आड़ लेकर अपनी दौलत का भरपूर दिखावा करते हैं। हालांकि वे सालभर में एक भी पैसा अपने समाज के मध्यम एवं निम्र मध्यम वर्ग की खुशहाली के लिये खर्च नहीं करते हैं। करें भी तो क्यों करें? उन्हें तो अपने ही लोगों को परेशान करने और बर्बाद करने के अपने घृणित कृत्यों से फुर्सत ही नहीं मिलती है।
हमारे अल्पसंख्यक जैन समुदाय के आदरणीय माने जाने वाले साधु-संत और साध्वियां भी ऐसे लोगों को अपने प्रवचन के माध्यम से सही रास्ते पर लाने में सफल नहीं हो रहे हैं। ये साधु-साध्वियां भी गौचरी, समवक्य एवं प्रतिक्रमण शब्दों को अपने जीवन में उतार कर पालना करना भूल गये हैं। अधिकांश साधु-साध्वियों को इन शब्दों के पीछे स्थापित निर्देशों के बारे में भी जानकारी नहीं होती है। तीर्थंकर महावीर के देवलोकगमन के बाद साधु-साध्वी समाज के प्रमुख माने जाने लगे, लेकिन आज ये समाज प्रमुख पूंजीपतियों के आगे नतमस्तक होते नजर आ रहे हैं और उसके पीछे एक ही कारण है कि वे जैन समाजबंधुओं के बीच में अपने आपको स्थापित करने के लिये पूंजीपतियों की दौलत का सहारा लेते हैं।
आगामी चातुर्मास अल्पसंख्यक जैन समुदाय के समाजबंधुओं एवं उनके गुरूओं (साधु-साध्वियों) के लिये एक मील का पत्थर साबित होगा! अगर वे अपने दायित्वों को सही ढंग से समझ कर उनका पालन करें और जैन संस्कृति को पुर्नजीवित करने के लिये कदम से कदम मिला कर आगे बढें तो समाज का उत्थान सम्भव है।

 
AGRAGAMI SANDESH

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