नई दिल्ली (अग्रगामी) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 7 जुलाई को रूस के अलावा 5 देशों की यात्रा पर रवाना हुये। वे ब्रिक्स देशों के सम्मेलन के साथ-साथ शंघाई कोऑपरेशन आर्गेनाइजेशन की मीटिंगों में भी भाग ले चुके हैं। इस के अलावा जिन देशों की यात्रा उन्होंने की वे हैं, उज्जबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कर्गिस्तान और तजाकिस्तान! ये पांचों देश भूतपूर्व युनाईटेड स्टेट्स ऑफ रशिया के हिस्से रहे हैं और यूएसएसआर के टूटने के बाद स्वतंत्र देश के रूप में उभरे हैं। इन देशों की यात्रा का भारत गणतंत्र को कितना फायदा होगा, यह कोई भी बताने की स्थिति में नहीं है। पिछली यूपीए की सरकार के आखिरी समय में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने अमरीका से पींगे बढ़ानी शुरू की थी और वर्तमान राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार तो अमरीकी राष्ट्रपति को चाय बना कर पिलाने की अपनी चतुराई से यह साबित करने में जुटी हैं कि मानो संयुक्तराज्य अमरीका के एक संघीय देश के अंग हों।
भारत गणतंत्र अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिये रूस सहित अन्य विश्वसनीय दोस्तों पर आश्रित रहा है। लेकिन जब से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश की बागडोर सम्भाली है वह अपनी सामरिक जरूरतों की पूर्ति के लिये अमरीका और इजराईल सहित अन्य यूरोपीय देशों पर आश्रित होने का प्रयास कर रही है। अमरीका का पुराना इतिहास अग देखें तो वह अपने हितों की पूर्ति के लिये दोस्ती का हाथ बढ़ाता है और जब उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है तो दुश्मनी की आंखें दिखाने से भी बाज नहीं आता है। यह स्थिति अमरीकियों के पुराने इतिहास से साबित हो जाती है।
20 के दशक में गोर्वाचोव से लेकर बोरिस येल्तसिन के सत्तारूढ़ रहने तक रूस टुकडे-टुकडे हो गया था और उसकी आर्थिक एवं सामरिक स्थिति भी काफी दयनीय स्थिति में आ गये थे। इस दौरान पश्चिमी देशों ने अमरीका के नेतृत्व में रूस सहित सभी वामपंथी देशों को बर्बाद करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद ब्लादीमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस ने मजबूती से आर्थिक प्रगति की और पश्चिमी देशों द्वारा उसके 70 प्रतिशत से ज्यादा आयात पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद रूस आज विश्व का सबसे बड़ा दूसरा देश बन कर वापस उभरा है। आज रूस ब्लादीमीर पुतिन के नेतृत्व में विश्व का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश बन गया है। पुतिन ने रूस को स्टालिन की तरह मजबूत कर खुश्चेव के वक्त का बुलंदी वाला देश बना दिया है।
विश्व में नये सामरिक गठबंधन की गूंज उठने लगी है। रूस, चीन, पाकिस्तान, ईरान सहित पूर्व युनाइटेड स्टेट्स ऑफ रशिया के छह देश उज्जबेकिस्तान तुर्कमेनीस्तान, कर्गिस्तान, तजाकिस्तान और बेलारूस नये सामरिक गठबंधन को मूर्तरूप देने हेतु तुले हैं। रूस और चीन के अन्य पड़ौसी देश इस गठबंधन में शामिल होने के लिये आतुर हैं। कहने को तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शंघाई कॉपरेशन आर्गेनाइजेशन व ब्रिक्स देशों की बैठक की आड़ लेकर इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलने की जुगत बैठाते रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने के लिये जिस तरीके से जुगत बैठाई गई उसे उचित नहीं कहा जा सकता।
आज परिस्थितियां एकदम उलट है। अमरीका से कुछ पाने की आस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अफगानिस्तान, फ्रांस और अमरीका में देश का खजाना लुटा रहे हैं। देश की जनता जानती है कि अपने नैसंगिक दोस्तों से किनारा कर अमरीका से पींगे बढ़ाना देश के लिये खतरनाक ही साबित होगा।
उधर देश के अन्दर के हाल भी ठीक नहीं चल रहे हैं। भारी संख्या में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी केंद्र सरकार से मुंह मोड़ कर अपने मूल केडर वाले स्टेटों में पलायन कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से अब तक लगभग 60 से ज्यादा आईएस अफसर केंद्र से राज्यों में अपने मूल केडर में पलायन कर चुके हैं। इससे भी साफ जाहिर होता है कि केंद्र की प्रशासनिक मशीनरी में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रीमण्डलीय सहयोगियों के व्यवहार से नाराजगी है और केंद्र में पदस्थापित आईएस अफसर परेशान हो रहे हैं और केंद्र से राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।
अभी भी वक्त है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार अपनी दकियानूसी पश्चिमी परस्त विदेश नीति का त्याग कर देश को आने वाली बाहरी विपदाओं से बचायेंगे। अन्यथा नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर लोकसभा के नये चुनाव करवा कर देश में नई जनतांत्रिक सरकार का मार्ग प्रशस्त करवायेंगे।
भारत गणतंत्र अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिये रूस सहित अन्य विश्वसनीय दोस्तों पर आश्रित रहा है। लेकिन जब से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश की बागडोर सम्भाली है वह अपनी सामरिक जरूरतों की पूर्ति के लिये अमरीका और इजराईल सहित अन्य यूरोपीय देशों पर आश्रित होने का प्रयास कर रही है। अमरीका का पुराना इतिहास अग देखें तो वह अपने हितों की पूर्ति के लिये दोस्ती का हाथ बढ़ाता है और जब उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है तो दुश्मनी की आंखें दिखाने से भी बाज नहीं आता है। यह स्थिति अमरीकियों के पुराने इतिहास से साबित हो जाती है।
20 के दशक में गोर्वाचोव से लेकर बोरिस येल्तसिन के सत्तारूढ़ रहने तक रूस टुकडे-टुकडे हो गया था और उसकी आर्थिक एवं सामरिक स्थिति भी काफी दयनीय स्थिति में आ गये थे। इस दौरान पश्चिमी देशों ने अमरीका के नेतृत्व में रूस सहित सभी वामपंथी देशों को बर्बाद करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद ब्लादीमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस ने मजबूती से आर्थिक प्रगति की और पश्चिमी देशों द्वारा उसके 70 प्रतिशत से ज्यादा आयात पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद रूस आज विश्व का सबसे बड़ा दूसरा देश बन कर वापस उभरा है। आज रूस ब्लादीमीर पुतिन के नेतृत्व में विश्व का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश बन गया है। पुतिन ने रूस को स्टालिन की तरह मजबूत कर खुश्चेव के वक्त का बुलंदी वाला देश बना दिया है।
विश्व में नये सामरिक गठबंधन की गूंज उठने लगी है। रूस, चीन, पाकिस्तान, ईरान सहित पूर्व युनाइटेड स्टेट्स ऑफ रशिया के छह देश उज्जबेकिस्तान तुर्कमेनीस्तान, कर्गिस्तान, तजाकिस्तान और बेलारूस नये सामरिक गठबंधन को मूर्तरूप देने हेतु तुले हैं। रूस और चीन के अन्य पड़ौसी देश इस गठबंधन में शामिल होने के लिये आतुर हैं। कहने को तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शंघाई कॉपरेशन आर्गेनाइजेशन व ब्रिक्स देशों की बैठक की आड़ लेकर इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलने की जुगत बैठाते रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने के लिये जिस तरीके से जुगत बैठाई गई उसे उचित नहीं कहा जा सकता।
आज परिस्थितियां एकदम उलट है। अमरीका से कुछ पाने की आस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अफगानिस्तान, फ्रांस और अमरीका में देश का खजाना लुटा रहे हैं। देश की जनता जानती है कि अपने नैसंगिक दोस्तों से किनारा कर अमरीका से पींगे बढ़ाना देश के लिये खतरनाक ही साबित होगा।
उधर देश के अन्दर के हाल भी ठीक नहीं चल रहे हैं। भारी संख्या में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी केंद्र सरकार से मुंह मोड़ कर अपने मूल केडर वाले स्टेटों में पलायन कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से अब तक लगभग 60 से ज्यादा आईएस अफसर केंद्र से राज्यों में अपने मूल केडर में पलायन कर चुके हैं। इससे भी साफ जाहिर होता है कि केंद्र की प्रशासनिक मशीनरी में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रीमण्डलीय सहयोगियों के व्यवहार से नाराजगी है और केंद्र में पदस्थापित आईएस अफसर परेशान हो रहे हैं और केंद्र से राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।
अभी भी वक्त है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार अपनी दकियानूसी पश्चिमी परस्त विदेश नीति का त्याग कर देश को आने वाली बाहरी विपदाओं से बचायेंगे। अन्यथा नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर लोकसभा के नये चुनाव करवा कर देश में नई जनतांत्रिक सरकार का मार्ग प्रशस्त करवायेंगे।


