पिछले कुछ वर्षों से देश में तीर्थयात्रा के नाम पर धार्मिक पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। तीर्थयात्रा करना व्यक्ति का नैर्सगिक अधिकार है और उसके लिये धर्म के अनुसार नियम कानून कायदे निर्धारित हैं। लेकन तीर्थयात्रा की आड़ लेकर जिस तरह धार्मिक पर्यटन उद्योग को बढ़ावा दिया जा रहा है वह देश के लिये खतरनाक है।
हिमालय क्षेत्र में सैंकड़ों हिम नदियों के साथ-साथ एक हजार से ज्यादा प्राकृतिक झीलें हैं। इनके रास्ते अवरूद्ध कर भारी संख्या में धार्मिक पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिये अवैध रूप से गेस्ट हाऊस और अन्य व्यवसायिक गतिविधियों को संचालित किया जा रहा है। पहाड़ों को काट कर अनुचित रूप से सड़कों और पुलों का निर्माण किया जा रहा है। नतीजन पहाड़ खोखले होते जा रहे हैं और बर्फ पिघल कर जानलेवा स्वरूप ले रही है। लेकिन कालाधन कमाने वाले रईसजादे प्रकृति की अवमानना से पीछे नहीं हट रहे हैं।
आज हालात यह है कि हिमालय क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन उद्योग के बेतरतीब फैलाव के कारण क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की स्थितियां पैदा हो गई है। क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग की तरह गर्मी का प्रकोप बढ़ता चला जा रहा है। नतीजन पहाड़ों पर हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं। वर्ष में आठ से दस महिने हिमखंड पिघलते हैं। नतीजन हिमालय रिजन में उपलब्ध एक हजार से ज्यादा झीलें पानी से लबालब हो गई है और हिमालय रिजन में ज्यादा बारिश हुई तो पानी के बहाव और हिमखंडों के टूटने से झीलें फट जायेंगी और उनका पानी पहाड़ी क्षेत्र के साथ-साथ मैदानी क्षेत्र में भी कहर बरपायेगा। धार्मिक पर्यटन उद्योग जैसी मानव निर्मित समस्या के चलते अगर प्रकृति ने कहर बरपाया तो मानव के पास इससे बचने का कोई इलाज नहीं है। अत: देशभर में खासकर हिमालय रीजन में धार्मिक पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध लगाया जाये। पूरे हिमालय रीजन के पहाड़ी क्षेत्र में स्थानीय नागरिकों के उपयोग एवं सामरिक उपयोग के अलावा सभी तरह के धार्मिक पर्यटन उद्योग हेतु उपलब्ध करवायी जा रही सुविधायें एवं यातायात की सुविधाओं पर अंकुश लगाया जाये तथा हिमालय रीजन को प्रकृति की छांव में प्राकृतिक रूप से पनपने दिया जाये।
वैसे भी धार्मिक पर्यटन उद्योग में कालेधन की खपत उद्योग की कुल क्षमता का 90 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो धार्मिक पर्यटन उद्योग कालेधन को खपाने के लिये एक महत्वपूर्ण जंक्शन है। ऐसी स्थिति में भी धार्मिक पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध आवश्यक है। हम यहां पुन: दोहरा रहे हैं कि तीर्थयात्रा करना व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है। लेकिन तीर्थयात्रा और तीर्थयात्रा की आड़ में धार्मिक पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देना प्रकृति के खिलाफ युद्ध छेडऩे जैसा है और इसे नहीं रोका गया तो प्रकृति के तांड़व को बर्दाश्त करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। देश की सरकार को चाहिये कि वह कुछ पूंजीपतियों और धन की लालसा बटोरने वालों को दरकिनार कर देशहित में धार्मिक पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध लगाये।
हिमालय क्षेत्र में सैंकड़ों हिम नदियों के साथ-साथ एक हजार से ज्यादा प्राकृतिक झीलें हैं। इनके रास्ते अवरूद्ध कर भारी संख्या में धार्मिक पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिये अवैध रूप से गेस्ट हाऊस और अन्य व्यवसायिक गतिविधियों को संचालित किया जा रहा है। पहाड़ों को काट कर अनुचित रूप से सड़कों और पुलों का निर्माण किया जा रहा है। नतीजन पहाड़ खोखले होते जा रहे हैं और बर्फ पिघल कर जानलेवा स्वरूप ले रही है। लेकिन कालाधन कमाने वाले रईसजादे प्रकृति की अवमानना से पीछे नहीं हट रहे हैं।
आज हालात यह है कि हिमालय क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन उद्योग के बेतरतीब फैलाव के कारण क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की स्थितियां पैदा हो गई है। क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग की तरह गर्मी का प्रकोप बढ़ता चला जा रहा है। नतीजन पहाड़ों पर हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं। वर्ष में आठ से दस महिने हिमखंड पिघलते हैं। नतीजन हिमालय रिजन में उपलब्ध एक हजार से ज्यादा झीलें पानी से लबालब हो गई है और हिमालय रिजन में ज्यादा बारिश हुई तो पानी के बहाव और हिमखंडों के टूटने से झीलें फट जायेंगी और उनका पानी पहाड़ी क्षेत्र के साथ-साथ मैदानी क्षेत्र में भी कहर बरपायेगा। धार्मिक पर्यटन उद्योग जैसी मानव निर्मित समस्या के चलते अगर प्रकृति ने कहर बरपाया तो मानव के पास इससे बचने का कोई इलाज नहीं है। अत: देशभर में खासकर हिमालय रीजन में धार्मिक पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध लगाया जाये। पूरे हिमालय रीजन के पहाड़ी क्षेत्र में स्थानीय नागरिकों के उपयोग एवं सामरिक उपयोग के अलावा सभी तरह के धार्मिक पर्यटन उद्योग हेतु उपलब्ध करवायी जा रही सुविधायें एवं यातायात की सुविधाओं पर अंकुश लगाया जाये तथा हिमालय रीजन को प्रकृति की छांव में प्राकृतिक रूप से पनपने दिया जाये।
वैसे भी धार्मिक पर्यटन उद्योग में कालेधन की खपत उद्योग की कुल क्षमता का 90 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो धार्मिक पर्यटन उद्योग कालेधन को खपाने के लिये एक महत्वपूर्ण जंक्शन है। ऐसी स्थिति में भी धार्मिक पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध आवश्यक है। हम यहां पुन: दोहरा रहे हैं कि तीर्थयात्रा करना व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है। लेकिन तीर्थयात्रा और तीर्थयात्रा की आड़ में धार्मिक पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देना प्रकृति के खिलाफ युद्ध छेडऩे जैसा है और इसे नहीं रोका गया तो प्रकृति के तांड़व को बर्दाश्त करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। देश की सरकार को चाहिये कि वह कुछ पूंजीपतियों और धन की लालसा बटोरने वालों को दरकिनार कर देशहित में धार्मिक पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध लगाये।


