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भाजपाई राज में धार्मिक स्थलों का व्यवसायिककरण हो रहा है!

जयपुर (अग्रगामी) हम पिछले कुछ अरसे से जयपुर नगर निगम की चारदिवारी क्षेत्र में हो रहे अवैध एवं बिना इजाजत तामीरात के बारे में लिखते रहे हैं। जयपुर नगर निगम का बोर्ड इसकी स्थापना से लेकर आज तक भारतीय जनता पार्टी का रहा है। वहीं जयपुर नगर निगम के उपमहापौर भी भारतीय जनता पार्टी के रहे हैं। नगर निगम की स्थापना के बाद सिर्फ एक बार नगर निगम में कांग्रेस का महापौर रहा है। अन्यथा मोहनलाल गुप्ता से लेकर निर्मल नाहटा तक भारतीय जनता पार्टी के महापौर रहे हैं। इनकी सदारत में जयपुर नगर निगम के चारदिवारी क्षेत्र में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण और बिना इजाजततामीर लिये कॉमशियल काम्प्लेक्सों का अवैध निर्माण जोरों पर है। हालांकि कानूनन ऐसा करना जुर्म है लेकिन जयपुर नगर निगम के अफसरों और कर्मचारियों की मिलीभगत से गैर कानूनी निर्माण चारदिवारी क्षेत्र में चालू हैं। कोढ़ में खाज यह है कि धार्मिक स्थलों को कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों में तबदील किया जा रहा है और शिकायत करने पर भी नगर निगम के अफसर और कर्मचारी कार्यवाही नहीं करते हैं। क्योंकि उनकी जेबें गरम कर दी जाती है और एक ही जगह सालों तक जमे रहने का कारण तो रामबाण है ही। आज भी दस साल से ज्यादा एक ही पद पर काम करने वाले कर्मचारियों को जोन कार्यालयों में देखा जा सकता है!
आपको ताजुब्ब होगा कि जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व क्षेत्र में स्थित एक ही रास्ते में आठ से ज्यादा धार्मिक स्थलों को व्यवसायिक स्थलों में बिना इजाजततामीर तब्दील करने हेतु निर्माण कार्य चल रहे है। ताजातरीन मामला है जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व क्षेत्र के ही मनीराम की कोठी का रास्ते का। जहां श्री दिगम्बर जैन मंदिर बैदान को ढ़हा कर कॉमर्शियल काम्पलेक्स बनाने की जुगत बैठाई जा रही है। ऑल इण्डिया यूथ लीग के स्टेट जनरल सेक्रेटरी जयन्त कुमार जैन ने इस प्रकरण की शिकायत मुख्यमंत्री से लेकर जयपुर नगर निगम के सभी सम्बन्धित अधिकारियों को की थी। स्थानीय नागरिकों ने भी इसकी शिकायत जयपुर नगर निगम के अफसरों और कर्मचारियों को की लेकिन अभी भी जयपुर नगर निगम भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के दबाव में आकर दोषियों के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही नहीं कर रहा है। इस मंदिर में रखी प्राचीन मूर्तियां जोकि भारतीय पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम 1973 की धारा 24 के तहत संरक्षित मानी जाने लायक है, वे भी मंदिर से लापता है। इस सम्बन्ध में एक व्यक्ति सुरेश बैद पुत्र कस्तूरचंद बैद का यह कथन सामने आया है कि यह सम्पत्ति उसकी निजी सम्पत्ति है। लेकिन कोई भी जैन मंदिर किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं हो सकती है और न ही है। यह तथ्य शायद भुलाया जा रहा है।
जयपुर नगर निगम के आधीन चारदिवारी क्षेत्र में किसी भी भवन को तोडऩे से पूर्व जयपुर नगर निगम की स्वीकृति ली जानी आवश्यक है। लेकिन भाजपाई नेताओं की मिलीभगत के चलते इस मंदिर को तोड़ दिया गया और मूर्तियों को खुर्दबुर्द कर दिया गया। मंदिर को तोडऩे की इजाजत भी नगर निगम से नहीं ली गई। इससे साफ जाहिर होता है कि भारतीय जनता पार्टी की वसुन्धरा राजे सरकार में बैठे वरिष्ठ नेताओं की शह पर ही यह गैर कानूनी कार्यवाही की गई नजर आती है। कार्यवाही से बचने के लिये यह अफवाह फैलाई जा रही है कि पुरामहत्व के इस 250 साल पुराने प्राचीन मंदिर को तोड़कर वास्तुशास्त्र के हिसाब से नये सिरे से बनाया जायेगा। मंदिर के चारों और व्यवसायिक गतिविधियां चल रही है और एक कॉमर्शियल काम्प्लेक्स का रास्ता तो मंदिर प्रांगण में से ही कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में ढाई सौ साल पुराने इस वास्तुविधि से बनी पुराधरोहर को तोड़ कर नये सिरे से बनाने के पीछे छिपे कारण उजागर होते हैं।
अग्रगामी संदेश के पास उपलब्ध दस्तावेजों की फोटो प्रतियां यह दर्शाती है कि यह मंदिर किसी की निजी सम्पत्ति नहीं है तथा इसमें उपलब्ध 32 से ज्यादा मूर्तियां पुरामहत्व की है। जिसके रजिस्ट्रेशन हेतु दिगम्बर मंदिर बैदान के तत्कालीन मंत्री आनंदी लाल गोदिका ने 30 सितम्बर, 1976 को पुरातत्व विभाग में रजिस्ट्रेशन हेतु आवेदन किया था। इसके अलावा अन्य कई मूर्तियां ऐसी भी है जो धार्मिक भावनाओं को आकर्षित करने वाली है। जिन्हें मंदिर से हटा दिया गया है। कुछ तो मलवे में दबी पड़ी हो सकती है। दिगम्बर जैन मंदिर बैदान का पूर्ववर्ती नाम दीवान दिगम्बर जैन मंदिर भी बताया जाता है। अग्रगामी संदेश के पास उपलब्ध पानी के बिल की फोटोप्रति भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। इस ही रास्ते में सात अन्य धार्मिक स्थल और भी ऐसे हैं जिन्हें व्यवसायिक स्थलों का स्वरूप दिया जा रहा है। जिनमें से तीन जैन धार्मिक स्थल व चार हिन्दू धार्मिक स्थल हैं।
इन ही में से एक अन्य दिगम्बर जैन मंदिर, म्यूनिसिपल नम्बर 3834-35, मनीराम की कोठी का रास्ता में स्थित है। इस जैन मंदिर में अब दुकानें बना दी गई है और धीरे-धीरे निर्माण करवा कर व्यवसायिक उपयोग किया जाना शुरू कर दिया गया है। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी जयपुर नगर निगम के अधिकारियों को नहीं हो, इसकी पूरी जानकारी और शिकायतें सभी अधिकारियों के कार्यालय में रेकार्ड पर उपलब्ध है और मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर जोन कार्यालय तक सबकी जानकारी में भी है। लेकिन निर्माण कार्य है कि रूक ही नहीं रहा और व्यवसायिक उपयोग तो अब भवन के अंदर जाने के लिये छोडी गई जगह पर भी चालू हो चुका है। इंतजार है कब पीछे दिवार खडी हो और शटर पर से मंदिर का नाम हटे तो दुकान का नाम रखा जाये। नगर निगम प्रशासन, भाजपा की राज्य सरकार और नगर निगम के भाजपाई बोर्ड के दबाव के चलते कानूनों की धज्जियां उडाते इस अवैध निर्माण पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। कानूनन तो इस अवैध निर्माण तो तत्काल ध्वस्त करना था और भूमि को सरकारी कब्जे में लेकर रेकार्ड पर दर्ज करना था।अब देखना यही है कि निगम प्रशासन, जिला प्रशासन और राज्य सरकार क्या कार्यवाही करते हैं?
इस विषय में विस्तार से आम जनता को हकीकत से अवगत करवायेंगे।

 
AGRAGAMI SANDESH

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