जयपुर/नई दिल्ली (अग्रगामी) पिछले दिनों इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया में सुभाषचंद्र बोस के परिवार की जासूसी की कहानी छाई रही। इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के धुरंधरों ने इस मामले में हकीकत जानने की रत्तीभर भी कोशिश नहीं की! यह साफ होता जा रहा है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के सहारे केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार नेताजी के हत्यारों के बचाने की जुगत बैठा रही प्रतीत होती है। 18 अगस्त, 1945 जिस दिन तो ताईवान में हवाईजहाज दुर्घटना में नेताजी सुभषचंद्र बोस के जल कर मरने की बात प्रचारित की गई है। उस वक्त ताईवान मित्र राष्ट्रों खासकर अमरिका के आधीन था। वहां के तत्कालीन अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से माना है कि 18 अगस्त, 1945 को कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई और नहीं उस दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत हुई। मुखर्जी आयोग ने भी अपने निष्कर्षों में माना है कि 18 अगस्त, 1945 को विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु नहीं हुई। हम भी बार-बार केंद्र सरकार से यह मांग करते रहे हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रकरण की निष्पक्षता से जांच करवाये।
जैसा कि हम अग्रगामी संदेश में पहले भी लिख चुके हैं कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या अमरीकी खूफिया एजेंसियों ने करवाई है। यह सत्य अब धीरे-धीरे उजागर होने लगा है। 18 अगस्त, 1945 को ताईवान अमेरिका की अगुवाई में मित्र राष्ट्रों के कब्जे में था और उनकी मौत की अफवाह फैलाने के पीछे अमरीकियों का हाथ रहा है। 18 अगस्त, 1945 को अमरिकी और मित्र राष्ट्रों की अमरिकी और ब्रिटिश खूफिया एजेंसियों द्वारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अपनी पकड़ में लेकर हवाई जहाज दुर्घटना का नाटक रचा गया होगा! अमेरिकी इस तरह की अफवाहें उड़ानें के माहिर माने जाते हैं। अंदेशा है कि अमरिकी और ब्रिटिश खूफिया एजेंसी की गिरफ्त में आने के बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस को क्यूबा द्वीप स्थित बदनाम जेल ग्वान्तानामो जेल में रखा गया जहां उन्हें वाटरबोर्डिंग तरीके से यातना देकर मारा गया। यह बदनाम जेल अमरीकियों द्वारा आज भी संचालित है और इसमें दूसरे विश्वयुद्ध के सैंकड़ों केदी आज भी यातना भुगत रहे हैं।
माना जाता है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के परिजनों की जासूसी का मुद्दा इसलिये उछाला गया कि देश के अवाम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या से सम्बन्धित सारे प्रकरण की जानकारी हांसिल करने की लालसा प्रबल होती जा रही है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सम्बन्धित दस्तावेजों को उजागर नहीं करने के मामले में भी केंद्र सरकारें कटघरे में है क्योंकि इन दस्तावेजों के उजागर होने से अमरीकियों और अंग्रेजों की करतूतें भी उजागर हो जायेंगी जो यह जाहिर कर सकती है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अमरीकियों ने क्यूबा द्वीप स्थित अमरीकियों की बदनाम जेल ग्वान्तानामो में वाटरबोर्डिंग जैसे निंदनीय तरीके को अपना कर यातना देकर हत्या कर दी।
ज्ञातव्य रहे कि फारवर्ड ब्लाक के तत्कालीन महासचिव चित्त वसू ने भी लोकसभा में विस्तार से मामला रखा था जो यह दर्शाता है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी।
भारतीय जनता पार्टी की नरेन्द्र मोदी सरकार अपने आप को राष्ट्रवादी सरकार कहलवाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। हमारा इस सरकार से आग्रह है कि दिल्ली में नेताजी सुभाषचंद्र बोस प्रकरण में हत्या और देशद्रोह एवं इससे सम्बन्धित अन्य धाराओं में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या करने वालों की जांच सीबीआई से करवाई जाये। रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग, आईबी एवं गृह मंत्रालय की अन्य जाचं एजेंसियों और खूफिया एजेंसियों तथा नागालैंड, मणिपुर रहित सम्बन्धित राज्यों की सरकारों से भी इस जांच में सहयोग लिया जाये। साथ ही केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार सहित अन्य प्रदेशों में उपलब्ध नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सम्बन्धित दस्तावेज नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या से सम्बन्धित जांच करने वाली एजेंसियों को दिलवाये जाये।
पंडित नेहरू द्वारा एटली को 1945 से 1947 तक लिखे गये नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित पत्र, रूस के राष्ट्रीय संग्रहालय तथा ब्रिटेन के राष्ट्रीय संग्रहालय में उपलब्ध नेता सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित अत्यन्त गोपनीय दस्तावेज तथा नेताजी से सम्बन्धित ब्रिटेन-अमरीका और रूस में उपलब्ध अत्यन्त गोपनीय युद्ध दस्तावेज, लार्ड माउण्टवेन्टन की व्यक्तिगत डायरी तथा ट्रांसफर आफ पावर से सम्बन्धित दस्तावेज, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के नेताजी से सम्बन्धित दस्तावेज इस जांच ऐजेंसी को उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करें। ताकि जांच ऐजेंसी सक्षमता से जांच कर सके।
सत्ताधीशों की बेरूखी को देखते हुए अब वक्त आ गया है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय लापता होने, उनकी यातना पूर्वक हत्या करने वालों के चेहरे बेनकाब करने के लिये देश के अवाम को एकजुट होकर संघर्ष करने का!
(पाठकों के आग्रह के कारण उक्त लेख पेज तीन पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।)
जैसा कि हम अग्रगामी संदेश में पहले भी लिख चुके हैं कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या अमरीकी खूफिया एजेंसियों ने करवाई है। यह सत्य अब धीरे-धीरे उजागर होने लगा है। 18 अगस्त, 1945 को ताईवान अमेरिका की अगुवाई में मित्र राष्ट्रों के कब्जे में था और उनकी मौत की अफवाह फैलाने के पीछे अमरीकियों का हाथ रहा है। 18 अगस्त, 1945 को अमरिकी और मित्र राष्ट्रों की अमरिकी और ब्रिटिश खूफिया एजेंसियों द्वारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अपनी पकड़ में लेकर हवाई जहाज दुर्घटना का नाटक रचा गया होगा! अमेरिकी इस तरह की अफवाहें उड़ानें के माहिर माने जाते हैं। अंदेशा है कि अमरिकी और ब्रिटिश खूफिया एजेंसी की गिरफ्त में आने के बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस को क्यूबा द्वीप स्थित बदनाम जेल ग्वान्तानामो जेल में रखा गया जहां उन्हें वाटरबोर्डिंग तरीके से यातना देकर मारा गया। यह बदनाम जेल अमरीकियों द्वारा आज भी संचालित है और इसमें दूसरे विश्वयुद्ध के सैंकड़ों केदी आज भी यातना भुगत रहे हैं।
माना जाता है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के परिजनों की जासूसी का मुद्दा इसलिये उछाला गया कि देश के अवाम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या से सम्बन्धित सारे प्रकरण की जानकारी हांसिल करने की लालसा प्रबल होती जा रही है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सम्बन्धित दस्तावेजों को उजागर नहीं करने के मामले में भी केंद्र सरकारें कटघरे में है क्योंकि इन दस्तावेजों के उजागर होने से अमरीकियों और अंग्रेजों की करतूतें भी उजागर हो जायेंगी जो यह जाहिर कर सकती है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अमरीकियों ने क्यूबा द्वीप स्थित अमरीकियों की बदनाम जेल ग्वान्तानामो में वाटरबोर्डिंग जैसे निंदनीय तरीके को अपना कर यातना देकर हत्या कर दी।
ज्ञातव्य रहे कि फारवर्ड ब्लाक के तत्कालीन महासचिव चित्त वसू ने भी लोकसभा में विस्तार से मामला रखा था जो यह दर्शाता है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी।
भारतीय जनता पार्टी की नरेन्द्र मोदी सरकार अपने आप को राष्ट्रवादी सरकार कहलवाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। हमारा इस सरकार से आग्रह है कि दिल्ली में नेताजी सुभाषचंद्र बोस प्रकरण में हत्या और देशद्रोह एवं इससे सम्बन्धित अन्य धाराओं में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या करने वालों की जांच सीबीआई से करवाई जाये। रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग, आईबी एवं गृह मंत्रालय की अन्य जाचं एजेंसियों और खूफिया एजेंसियों तथा नागालैंड, मणिपुर रहित सम्बन्धित राज्यों की सरकारों से भी इस जांच में सहयोग लिया जाये। साथ ही केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार सहित अन्य प्रदेशों में उपलब्ध नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सम्बन्धित दस्तावेज नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हत्या से सम्बन्धित जांच करने वाली एजेंसियों को दिलवाये जाये।
पंडित नेहरू द्वारा एटली को 1945 से 1947 तक लिखे गये नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित पत्र, रूस के राष्ट्रीय संग्रहालय तथा ब्रिटेन के राष्ट्रीय संग्रहालय में उपलब्ध नेता सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित अत्यन्त गोपनीय दस्तावेज तथा नेताजी से सम्बन्धित ब्रिटेन-अमरीका और रूस में उपलब्ध अत्यन्त गोपनीय युद्ध दस्तावेज, लार्ड माउण्टवेन्टन की व्यक्तिगत डायरी तथा ट्रांसफर आफ पावर से सम्बन्धित दस्तावेज, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के नेताजी से सम्बन्धित दस्तावेज इस जांच ऐजेंसी को उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करें। ताकि जांच ऐजेंसी सक्षमता से जांच कर सके।
सत्ताधीशों की बेरूखी को देखते हुए अब वक्त आ गया है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय लापता होने, उनकी यातना पूर्वक हत्या करने वालों के चेहरे बेनकाब करने के लिये देश के अवाम को एकजुट होकर संघर्ष करने का!
(पाठकों के आग्रह के कारण उक्त लेख पेज तीन पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।)


