जयपुर (अग्रगामी) वर्ष 2015 आ गया है! अवाम अब सिर्फ यही जानना चाहता है कि राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार राज्य के धरातल पर कब गतिशील होगी? अधीनस्थ सेवा चयन आयोग सहित अन्य कई मुद्दों की आड़ लेकर वसुन्धरा राजे सरकार बेरोजगारों को रोजगार से वंचित कर रही है। सरकारी स्तर से प्रयास ये किये जा रहे हैं कि नियुक्तियों में जितनी देरी हो सकती हो उतनी की जाये। तृतीय श्रेणी के पदों पर नियुक्तियों को नहीं देने से एक ओर प्रशासनिक व शैक्षणिक स्तर पर शिक्षकों और कर्मचारियों के नहीं होने से कार्यों में शिथिलता आ गई है। वहीं बेरोजगारों की फौज अपनी नियुक्तियों की आस लिये दर-दर भटक रही है। यही हाल उच्च ग्रेड के पदों के हैं! जहां हजारों पद खाली हैं वहीं कार्यरत वरिष्ठ अधिकारियों, कर्मचारियों व अध्यापकों के थोक में ट्रांसफर कर देने से पूरे प्रदेश में प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था चरमरा गई है। जिसका विपरीत असर अवाम पर (खास कर बच्चों पर) पड़ रहा है।
पुलिस विभाग में नफरी की कमी के कारण 16 घंटों या इससे भी अधिक समय तक पुलिसकमियों को कार्य करना पड़ रहा है। नतीजन अपनी कार्यक्षमता से अधिक गतिशील होने के कारण उन्हें मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है। उधर कानून और व्यवस्था की स्थिति पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा है। नफरी के अभाव में पुलिस थानों का बीट सिस्टम भी चरमरा गया है। पुलिस-पब्लिक संवाद में दिक्कतें आ रही है। थानों की गुप्तचर सेवा भी चरमरा गई है। वहीं महिला डेस्कों पर महिला पुलिस कर्मचारियों के स्थान पर पुरूष कर्मचारी नजर आते है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि थानों में महिला पुलिसकर्मियों की कमी रहती है। होना यह चाहिये कि कानून और व्यवस्था की स्थिति सम्भालने वाले कर्मचारियों को अन्य कार्यों में न लगाया जाये। ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति सुधरने में मदद मिले।
मंहगाई की बात करें तो वसुन्धरा राजे सरकार कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों, जमाखोरों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिये तैयार नहीं लगती है! नतीजन जमाखोरों, मुनाफाखोरों और कालाबाजारियों के हौंसले बुलंद हैं और मंहगाई अवाम के सिर पर चढ़ कर बोल रही है। वसुन्धरा राजे सरकार विधानसभा में बहुमत के बूते पर लगता है कि जनता पर टैक्स का बोझ डालने का मानस बना चुकी है। पिछले साल तेल कम्पनियों ने अवाम को राहत देने के लिये पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती की थी। लेकिन राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार ने करों में वृद्धि कर तेल कम्पनियों द्धारा अवाम को दी गई राहत को अपनी झोली में समेट लिया। नतीजन आम अवाम को मंहगाई से दो चार होना पड़ रहा है।
प्रदेश के सरकारी अमले में व्याप्त भ्रष्टाचार यथावत है! छोटे-छोटे कामों के लिये अवाम को रिश्वत शब्द से रूबरू होना पड़ रहा है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार और प्रशासन के स्तर से भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार के पनपने से आम अवाम को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं खुद मुख्यमंत्री के आधीन विभागों में भी भ्रष्टाचार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार की आंखें सिर्फ ग्रामीण सरकार के चुनावों पर ही केंद्रित है। सरकार की नजर में येनकेन प्रकेरण ग्रामीण सरकार के चुनावों में जीत हांसिल करना मुख्य मुद्दा है। ऐसी स्थिति के मद्देनजर भी राजस्थान में प्रशासनिक भ्रष्टाचार थम नहीं रहा है।
सरकार सम्भागों में राजनैतिक पिकनिक मनाने के बाद जैसे सन्नीपात में जकड़ी अकड़ी पड़ी हालत में हो गई है! प्रहला गुंजल, नन्दलाल मीणा और भवानीसिंह राजावत के अटपटे बोलों ने भी अवाम के माथे पर शिकन ला दी है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार और प्रशासन किंकर्तव्यमूढ़ होकर बैठे हैं। कुछ लोगों द्वारा धर्मान्धता की आड़ लेकर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति को बिगाडऩे के लिये प्रयास किये जा रहे हैं, जिन्हें रोकने के लिये भी सरकार और प्रशासन सक्रिय नहीं है?
राजस्थान प्रदेश मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की आग में झुलस रहा है और वसुन्धरा राजे सरकार अर्कमण्यता का तड़का भी लग रहा है। अब राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार के नेतृत्व में किसके अच्छे दिन आयेंगे? क्योंकि राजस्थान की भाजपा सरकार के मंत्रियों को राजस्थान के गांवों की सरकार के चुनाव से फुरसत ही नहीं मिल रही है। वहीं गांवों की सरकार के चुनाव के बाद भाजपा मंत्रियों और विधायकों को दिल्ली सरकार के चुनाव में व्यस्त करने की व्यवस्था भी की जा रही है। अत: यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को राज्य की जनता की खुसहाली के लिये काम करने का कोई मानस बनता नजर नहीं आ रहा है।
पुलिस विभाग में नफरी की कमी के कारण 16 घंटों या इससे भी अधिक समय तक पुलिसकमियों को कार्य करना पड़ रहा है। नतीजन अपनी कार्यक्षमता से अधिक गतिशील होने के कारण उन्हें मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है। उधर कानून और व्यवस्था की स्थिति पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा है। नफरी के अभाव में पुलिस थानों का बीट सिस्टम भी चरमरा गया है। पुलिस-पब्लिक संवाद में दिक्कतें आ रही है। थानों की गुप्तचर सेवा भी चरमरा गई है। वहीं महिला डेस्कों पर महिला पुलिस कर्मचारियों के स्थान पर पुरूष कर्मचारी नजर आते है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि थानों में महिला पुलिसकर्मियों की कमी रहती है। होना यह चाहिये कि कानून और व्यवस्था की स्थिति सम्भालने वाले कर्मचारियों को अन्य कार्यों में न लगाया जाये। ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति सुधरने में मदद मिले।
मंहगाई की बात करें तो वसुन्धरा राजे सरकार कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों, जमाखोरों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिये तैयार नहीं लगती है! नतीजन जमाखोरों, मुनाफाखोरों और कालाबाजारियों के हौंसले बुलंद हैं और मंहगाई अवाम के सिर पर चढ़ कर बोल रही है। वसुन्धरा राजे सरकार विधानसभा में बहुमत के बूते पर लगता है कि जनता पर टैक्स का बोझ डालने का मानस बना चुकी है। पिछले साल तेल कम्पनियों ने अवाम को राहत देने के लिये पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती की थी। लेकिन राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार ने करों में वृद्धि कर तेल कम्पनियों द्धारा अवाम को दी गई राहत को अपनी झोली में समेट लिया। नतीजन आम अवाम को मंहगाई से दो चार होना पड़ रहा है।
प्रदेश के सरकारी अमले में व्याप्त भ्रष्टाचार यथावत है! छोटे-छोटे कामों के लिये अवाम को रिश्वत शब्द से रूबरू होना पड़ रहा है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार और प्रशासन के स्तर से भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार के पनपने से आम अवाम को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं खुद मुख्यमंत्री के आधीन विभागों में भी भ्रष्टाचार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार की आंखें सिर्फ ग्रामीण सरकार के चुनावों पर ही केंद्रित है। सरकार की नजर में येनकेन प्रकेरण ग्रामीण सरकार के चुनावों में जीत हांसिल करना मुख्य मुद्दा है। ऐसी स्थिति के मद्देनजर भी राजस्थान में प्रशासनिक भ्रष्टाचार थम नहीं रहा है।
सरकार सम्भागों में राजनैतिक पिकनिक मनाने के बाद जैसे सन्नीपात में जकड़ी अकड़ी पड़ी हालत में हो गई है! प्रहला गुंजल, नन्दलाल मीणा और भवानीसिंह राजावत के अटपटे बोलों ने भी अवाम के माथे पर शिकन ला दी है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार और प्रशासन किंकर्तव्यमूढ़ होकर बैठे हैं। कुछ लोगों द्वारा धर्मान्धता की आड़ लेकर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति को बिगाडऩे के लिये प्रयास किये जा रहे हैं, जिन्हें रोकने के लिये भी सरकार और प्रशासन सक्रिय नहीं है?
राजस्थान प्रदेश मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की आग में झुलस रहा है और वसुन्धरा राजे सरकार अर्कमण्यता का तड़का भी लग रहा है। अब राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार के नेतृत्व में किसके अच्छे दिन आयेंगे? क्योंकि राजस्थान की भाजपा सरकार के मंत्रियों को राजस्थान के गांवों की सरकार के चुनाव से फुरसत ही नहीं मिल रही है। वहीं गांवों की सरकार के चुनाव के बाद भाजपा मंत्रियों और विधायकों को दिल्ली सरकार के चुनाव में व्यस्त करने की व्यवस्था भी की जा रही है। अत: यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को राज्य की जनता की खुसहाली के लिये काम करने का कोई मानस बनता नजर नहीं आ रहा है।


