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आलू व्यापारियों और आरएसएस के अच्छे दिन आये!

देश के आलू आयात व निर्यात करने वाले व्यापारियों के पौबारह पच्चीस हो रही है। पहले आलू निर्यात करके नोट कमाये और अब सरकार आलू आयात करवा कर उनकी झोली भारने की जुगत बैठा रही है।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ भी मोदी सरकार की बैसाखियों पर चलकर देश में हिन्दुत्व का ऐजेंडा लागू करने में जुटा है। आरएसएस पंथी तो इस देश का नाम बदल कर भारत के स्थान पर हिन्दुस्तान करने पर तुले हैं। जबकि हिन्दु, मुसलमान, ईसाई और यहुदियों का भारत से कोई लेनादेना नहीं है। ये सब मेसोपोटामिया में पल्लवित हिब्रु संस्कृति से निकले हुये धर्म हैं और इन धार्मिक समूहों के लोग ही आपस में लड़ते हैं। भारत में पल्लवित जिन संस्कृति (जैन संस्कृति) और वैदिक संस्कृति के अनुयायी शांतिप्रिय होते हैं और आपस में नहीं लड़ते हैं। यही स्थिति बौद्ध मत के अनुयायियों की भी है।
देश में आलू की कमी के पीछे भी हिब्रु संस्कृति से निकले हिन्दु, इस्लाम (मुसलमान) समुदाय के व्यापारियों का ही हाथ है।
यही लोग व्यापारिक स्थल पर जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त हैं और समय-समय पर अलग-अलग जिंसों की कमी पैदा कर मुनाफा कमाले हैं तथा इसमें सरकारी हुक्कामों व राजनैतिक नेताओं का भी हाथ होता है!
देश मेें आलू का टोटा कैसे पैदा हुआ इसकी उच्च स्तरीय न्यायिक जांच होनी आवश्यक है। यह उच्च स्तरीय न्यायिक जांच सर्वोच्च न्यायालय के सिटींग जजों की निगरानी में होनी चाहिये। इसके साथ ही भारत को हिन्दुस्तान आरोपित करने वालों के खिलाफ भी न्यायिक जांच बैठाई जानी आवश्यक है। इस देश के नागरिक भारतीय हैं और देश का नाम भारत है। हमारा हिन्दुओं और हिन्दुस्तान से कोई लेनादेना नहीं है, हम भारतीय हैं और हमारे देश का नाम भारत है यह सबको अच्छी तरह समझ लेना चाहिये।
ऐसा लगने लगा है कि आलू व्यापारियों और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अच्छे दिन लाने के लिये नरेन्द्र मोदी सरकार एडीचोटी का जोर लगाने पर तुली है।

 
AGRAGAMI SANDESH

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