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श्राविका आश्रम पाठशाला बनाम वीर बालिका स्कूल!

जयपुर (अग्रगामी) टाँक परिवार के कुछ लोग वीर बालिका स्कूल की संस्थाओं को अपनी बपौती समझते हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। वीर बालिका स्कूल जिसका कि पूर्व में नाम श्राविका आश्रम पाठशाला था, उसकी स्थापना स्व.सेठ श्री बाछूलाल जी बुरड़ और उनके पुत्र स्व.सेठ श्री तेजकरण जी बुरड़ द्वारा विक्रम संवत 1965 में साध्वी मणिश्री महाराज सा. के निर्देशानुसार की गई थी। उसके बाद इस प्राथमिक संस्था की प्रशासनिक व्यवस्था महत्तरा स्व.मणिश्री महाराज सा. ने की तथा सम्पूर्ण आर्थिक व्यवस्था की जिम्मेदारियां  स्व.सेठ श्री तेजकरण जी बुरड़ अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में अकेले ही वहन करते रहे। इस संस्था का नाम बदल कर विक्रम संवत 1972 में श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला रखा गया। श्री राजरूप टाँक तो मात्र सात वर्ष की आयु में स्व. श्री छगनलाल जी टाँक के यहां गौद आये थे अत: स्कूल की स्थापना के प्रकरण में इनका कोई योगदान ही नहीं है और राजमल सुराना से लेकर वर्तमान में जो उनके वंशज हैं उनका भी इस स्कूल की स्थापना में कोई योगदान नहीं रहा है।
वीर बालिका स्कूल जिसका कि पूर्ववर्ती नाम श्राविका आश्रम पाठशाला/श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला है को मूलत: छोटी विद्यार्थिनी साध्वियों के अध्ययन एवं श्राविकाओं को विभिन्न धार्मिक ग्रंथों के परिपेक्षय में विस्तृत अध्ययन कराने हेतु स्थापित किया गया था और स्व.सेठ तेजकरण जी बुरड़ के निवेदन पर साध्वी पुण्यश्री जी ने इस स्कूल में समाज की छोटी बालिकाओं के अध्यापन की भी इजाजत दे दी थी। विक्रम संवत 1972 में छोटी बालिकाओं के अध्यापन का कार्य भी श्राविका आश्रम पाठशाला में शुरू हो गया था और श्राविका आश्रम पाठशाला को नया नाम दिया गया और तद्नानुसार नया नाम श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला रखा गया। उस साल चातुर्मास में पूज्य मुनिवर्य क्षेमसागर जी महाराज, वीरपुत्र आनंदसागर जी महाराज व वल्लभ सागर जी महाराज भी पधारे थे और उन्होंने भी सेठ तेजकरण जी बुरड़ के इन प्रयासों पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए अपना धर्मलाभ दिया अत: यह कथन पूर्णत: असत्य है कि वीर बालिका स्कूल की स्थापना में टाँक परिवार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई योगदान है।
महत्तरा स्व.साध्वी पुण्यश्री जी की जीवनी (जोकि स्व. साध्वी सज्जनश्री जी द्वारा लिखित पुस्तक पुण्य जीवन ज्योति सहित अन्य पुस्तकों में भी श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला (वर्तमान में वीर बालिका स्कूल) की स्थापना और उसके लिये आर्थिक सहयोग स्व.सेठ श्री तेजकरण जी बुरड़ द्वारा निजी रूप से वहन करने का उल्लेख है)। टाँक और सुराना परिवारों ने तो आजादी के बाद इस संस्था पर अपना आधिपत्य जमाया व 1956 में सरकारी अनुदान हेतु पंजीकरण की अनिवार्यता के चक्कर में अपने आप को इस संस्था का अघोषित मालिक करार दिया। अब तो गिरधारीलाल टाँक यह कहते फिर रहे बताये जाते हैं कि वीर बालिका स्कूल उनकी निजी सम्पत्ती है इससे किसी का कोई लेनादेना नहीं है। जबकि इस स्कूल की स्थापना के समय वे इस संसार में आये ही नहीं थे और चिड़ावा में राजरूप श्रीमाल का जन्म भी नहीं हुआ। हम इस विषय में आगे विस्तृत रूप से जानकारी देंगे।

 
AGRAGAMI SANDESH

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