जयपुर (अग्रगामी) राज्य में चार विधानसभाओं के उपचुनाव हो चुके हैं और परिणाम 16 सितम्बर को घोषित होना है। विधानसभा के इन उपचुनावों में मात्र 66 प्रतिशत वोटिंग होने से यह बात उजागर होती है कि आम अवाम में भाजपा अच्छे दिन आने वाले हैं शगुफे का असर कम होता जा रहा है। मंहगाई, कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, जमाखोरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से लगता है राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार ने किनारा कर दिया है।
पहले भरतपुर फिर बीकानेर और उदयपुर संभागों में भटकने के बाद अब कोटा सम्भाग में भटकने की तैयारी कर रही है। हालांकि भरतपुर, बीकानेर और उदयपुर संभागों में गांव-गांव तक जाने का दम भरने वाली भाजपाई सरकार की नाक के नीचे इन संभागों में स्थानीय प्रशासन के काम करने का तरीका वही पुराना है और उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। समस्यायें जस की तस है और जनता की पीड़ायें भी जस की तस हैं।
हालांकि सरकार के मंत्रियों और आला अफसरों के सम्भागीय दौरों के कारण प्रदेश स्तर पर सरकार की पकड़ अफसरों और कारिंदों पर कमजोर हुई है बावजूद इसके राजस्थान की भाजपा सरकार राजधानी जयपुर में टिकने के मूड में नजर नहीं आ रही है। 163 विधायकों के साथ विधानसभा में अपना बहुमत मजबूत होने के बावजूद वसुन्धरा राजे सरकार न तो मंत्रीमण्डल का पुर्नगठन कर पा रही है और न ही महत्वपूर्ण निर्णय ले पा रही है।
अवाम सरकार द्वारा जनहित के निर्णय नहीं लेने से परेशान है। वहीं कुर्सी की आस लगाये विधायक और अन्य भाजपाई नेता मुख्यमंत्री के दर पर भटक रहे हैं। प्रदेश पूरी तरह से अफसरशाही और नौकरशाही के शिकंजों में जकड़ा हुआ है। बार और बैंच के झगड़े को ही हम उदाहरण के रूप में लें तो अगर सरकार पहल करती तो यह मामला दो महीने से ज्यादा समय तक नहीं खिंचता। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार को सम्भाग स्तर पर पिकनिक मनाने से फुर्सत मिले तभी तो प्रादेशिक स्तर की समस्याओं की ओर उसका ध्यान जाये। अब भी समय है कि सरकार सम्भागों में भटकने के बजाय जयपुर में अपने दफ्तरों में बैठे और मंत्रीमण्डल समग्र रूप से पूरे प्रदेश में अपने विभागों की गतिविधियों पर नियन्त्रण करे।
पहले भरतपुर फिर बीकानेर और उदयपुर संभागों में भटकने के बाद अब कोटा सम्भाग में भटकने की तैयारी कर रही है। हालांकि भरतपुर, बीकानेर और उदयपुर संभागों में गांव-गांव तक जाने का दम भरने वाली भाजपाई सरकार की नाक के नीचे इन संभागों में स्थानीय प्रशासन के काम करने का तरीका वही पुराना है और उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। समस्यायें जस की तस है और जनता की पीड़ायें भी जस की तस हैं।
हालांकि सरकार के मंत्रियों और आला अफसरों के सम्भागीय दौरों के कारण प्रदेश स्तर पर सरकार की पकड़ अफसरों और कारिंदों पर कमजोर हुई है बावजूद इसके राजस्थान की भाजपा सरकार राजधानी जयपुर में टिकने के मूड में नजर नहीं आ रही है। 163 विधायकों के साथ विधानसभा में अपना बहुमत मजबूत होने के बावजूद वसुन्धरा राजे सरकार न तो मंत्रीमण्डल का पुर्नगठन कर पा रही है और न ही महत्वपूर्ण निर्णय ले पा रही है।
अवाम सरकार द्वारा जनहित के निर्णय नहीं लेने से परेशान है। वहीं कुर्सी की आस लगाये विधायक और अन्य भाजपाई नेता मुख्यमंत्री के दर पर भटक रहे हैं। प्रदेश पूरी तरह से अफसरशाही और नौकरशाही के शिकंजों में जकड़ा हुआ है। बार और बैंच के झगड़े को ही हम उदाहरण के रूप में लें तो अगर सरकार पहल करती तो यह मामला दो महीने से ज्यादा समय तक नहीं खिंचता। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार को सम्भाग स्तर पर पिकनिक मनाने से फुर्सत मिले तभी तो प्रादेशिक स्तर की समस्याओं की ओर उसका ध्यान जाये। अब भी समय है कि सरकार सम्भागों में भटकने के बजाय जयपुर में अपने दफ्तरों में बैठे और मंत्रीमण्डल समग्र रूप से पूरे प्रदेश में अपने विभागों की गतिविधियों पर नियन्त्रण करे।


