नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) राजस्थान की जनता को अब राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित मंहगाई से दो-दो हाथ करने के लिये तैयार हो जाना चाहिये! राज्य सरकार से जुड़े सूत्रों से प्राप्त जानकारियों को माना जाये तो मई-जून, 2014 में आने वाले राज्य के बजट में टैक्सों की बौछार हो सकती है।
राज्य के सरस डेयरी उत्पादनों के दामों में अचानक बढोतरी ने स्पष्ट संकेत दे दिये हैं कि राज्य में भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार उपभोक्ता जिंसों पर टैक्सों में बढोतरी का लगभग मानस बना चुकी है और लोकसभा चुनावों में जो नतीजे आयेंगे उनके हिसाब से टैक्स दरों में बढोतरी को कम या ज्यादा कर सकती है।
सूत्र बताते हैं कि टैक्स बढोतरी के पीछे सरकार का तर्क यह रहेगा कि पिछले लम्बे अन्तराल से टैक्स पैटर्न में कोई बदलाव नहीं हुआ है अत: अब टैक्स बढोतरी करना सरकार की मजबूरी है। चूंकि राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार के पास राज्य विधानसभा में दो तिहाई से ज्यादा बहुमत है, नतीजन विपक्ष का विरोध आड़े नहीं आयेगा! वहीं वसुन्धरा राजे को अपने मंत्रिमण्डल का विस्तार भी करना है। विधानसभा सत्र प्रारम्भ होने से पहिले उन्हें लगभग 18 मंत्रियों की नियुक्ति करनी है वहीं राज्य में विधान परिषद् का भी गठन होना है और आनुपातिक तरीके से भाजपा के विधान परिषद् सदस्य भी मनोनीत होने हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा में से कोई भी नेता टैक्स बढोतरी के मामले में अपनी जबान नहीं खोलेगा। बिजली की दरों में बढोतरी के मामले में भी लगभग निर्णय हो चुका है और बढोतरी के आदेश किस दिन निकाले जायेंगे, बस अवाम को उसका इन्तजार है।
शर्मनाक स्थिति यह है कि सरकार टैक्स बढोतरी के जरिये जनता की जेब काटने की तैयारी में तो जुटी है, लेकिन जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों की लगाम कस कर जनता को मंहगाई से निजात दिलाने में उसकी कोई रूचि नहीं है। सरकार चाहे तो उपभोक्ता जिन्सों की कीमतों पर लगाम कस कर भू-माफियाओं-बिल्डर माफिया की नकेल कस कर अपने खजाने को भर सकती है, लेकिन लगता है, शायद माफियाओं के आगे भाजपा सरकार बेबस है।
पिछले चार महिनों में राज्य की मुख्यमंत्री और उनका सारा अमला भारतीय जनता पार्टी के मिशन-25 में जुटे रहे। गत 24 अप्रेल को द्वितीय चरण का मतदान होने के बाद अवाम को उम्मीद जगी थी कि राजस्थान में भाजपा की सरकार हरकत में आयेगी और अवाम के दुख तकलीफों को दूर करने में जुट जायेगी। लेकिन सरकार की ऐसी हालत हो गई जैसे कि सन्नीपात में जकड़ी अकड़ी अपने दफ्तरों में पड़ी हो।
आज भी हालात यह हैं कि भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार लगता है कि अवाम के हित में कुछ भी करने के लिये मानस नहीं बना पाई है। देखना यही है कि सरकार अपने सोच या विजन के साथ सक्रिय होती है या फिर अवाम के आक्रोशपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतरने के बाद सक्रिय होगी।
राज्य के सरस डेयरी उत्पादनों के दामों में अचानक बढोतरी ने स्पष्ट संकेत दे दिये हैं कि राज्य में भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार उपभोक्ता जिंसों पर टैक्सों में बढोतरी का लगभग मानस बना चुकी है और लोकसभा चुनावों में जो नतीजे आयेंगे उनके हिसाब से टैक्स दरों में बढोतरी को कम या ज्यादा कर सकती है।
सूत्र बताते हैं कि टैक्स बढोतरी के पीछे सरकार का तर्क यह रहेगा कि पिछले लम्बे अन्तराल से टैक्स पैटर्न में कोई बदलाव नहीं हुआ है अत: अब टैक्स बढोतरी करना सरकार की मजबूरी है। चूंकि राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार के पास राज्य विधानसभा में दो तिहाई से ज्यादा बहुमत है, नतीजन विपक्ष का विरोध आड़े नहीं आयेगा! वहीं वसुन्धरा राजे को अपने मंत्रिमण्डल का विस्तार भी करना है। विधानसभा सत्र प्रारम्भ होने से पहिले उन्हें लगभग 18 मंत्रियों की नियुक्ति करनी है वहीं राज्य में विधान परिषद् का भी गठन होना है और आनुपातिक तरीके से भाजपा के विधान परिषद् सदस्य भी मनोनीत होने हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा में से कोई भी नेता टैक्स बढोतरी के मामले में अपनी जबान नहीं खोलेगा। बिजली की दरों में बढोतरी के मामले में भी लगभग निर्णय हो चुका है और बढोतरी के आदेश किस दिन निकाले जायेंगे, बस अवाम को उसका इन्तजार है।
शर्मनाक स्थिति यह है कि सरकार टैक्स बढोतरी के जरिये जनता की जेब काटने की तैयारी में तो जुटी है, लेकिन जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों की लगाम कस कर जनता को मंहगाई से निजात दिलाने में उसकी कोई रूचि नहीं है। सरकार चाहे तो उपभोक्ता जिन्सों की कीमतों पर लगाम कस कर भू-माफियाओं-बिल्डर माफिया की नकेल कस कर अपने खजाने को भर सकती है, लेकिन लगता है, शायद माफियाओं के आगे भाजपा सरकार बेबस है।
पिछले चार महिनों में राज्य की मुख्यमंत्री और उनका सारा अमला भारतीय जनता पार्टी के मिशन-25 में जुटे रहे। गत 24 अप्रेल को द्वितीय चरण का मतदान होने के बाद अवाम को उम्मीद जगी थी कि राजस्थान में भाजपा की सरकार हरकत में आयेगी और अवाम के दुख तकलीफों को दूर करने में जुट जायेगी। लेकिन सरकार की ऐसी हालत हो गई जैसे कि सन्नीपात में जकड़ी अकड़ी अपने दफ्तरों में पड़ी हो।
आज भी हालात यह हैं कि भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार लगता है कि अवाम के हित में कुछ भी करने के लिये मानस नहीं बना पाई है। देखना यही है कि सरकार अपने सोच या विजन के साथ सक्रिय होती है या फिर अवाम के आक्रोशपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतरने के बाद सक्रिय होगी।


