जयपुर (अग्रगामी) जयपुर महानगर के पॉश इलाके की करोड़ों रूपये की जमीनों पर अतिक्रमण कर बिना इजाजत तामीर लिये अवैध व्यवसायिक निर्माण किये जा रहे हैं और जयपुर नगर निगम के भ्रष्ट और नाकारा अफसर और कारिंदे नोटों की गड्डियों के नीचे दबे इन गैर कानूनी निर्माणों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व क्षेत्र के आगरा रोड़ अग्रवाल कॉलेज और संजय मार्केट (परकोटे) के बीच सरकार ने मिश्रा मार्केट के नाम से मार्केट बना कर ट्रांसपोर्ट काम में जुटे तकनीकी लोगों को बसाया था, बाद में वर्ष 1993 तक क्रमबद्ध तरीके से इन लोगों को आगरा रोड़ ट्रांसपोर्ट नगर और दिल्ली बाईपास रोड़ पर पुनर्वासित कर दिया गया। इसके चलते मिश्रा मार्केट खाली हो गया और करोड़ों रूपये की इस खाली जमीन पर लोगों ने अतिक्रमण और अवैध कब्जे कर अनधिकृत निर्माण करने शुरू कर दिये। लेकिन अब जयपुर नगर निगम के अफसरों और कारिंदों की मिलीभगत से इन गैरकानूनी बिना इजाजत तामीर अवैध कॉमर्शियल निर्माण करने वाले भूमाफियाओं ने अब खुले आम सरकारी जमीन पर कॉमर्शियल निर्माण कर बेचने का गोरखधंधा भी चालू कर दिया है।
जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व के आयुक्त भी मानते हैं कि मिश्रा मार्केट क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण की इजाजत नहीं दी गई है! सूचना का अधिकार कानून के तहत मिश्रा मार्केट से सम्बन्धित मांगी गई सूचना के जवाब में वे लिखते हैं कि ''हवामहल जोन (पूर्व) कार्यालय द्वारा निर्माण की स्वीकृति नहीं दी गई है। जिसके कारण कोई कार्यवाही नहीं की गई है।" अब इन आयुक्त महोदय को कौन समझाये कि जब निर्माण के लिये स्वीकृति उनके स्तर से नहीं दी गई है तो फिर बिना इजाजत तामीर हो रहे निर्माणों के खिलाफ राजस्थान नगर पालिका अधिनियम की धारा 194 और 245 के तहत कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है?
सूत्रों ने अग्रगामी संदेश को बताया कि मिश्रा मार्केट और उसके आसपास अधिकांश जमीन सरकारी स्वामित्व की है और इस जमीन की कीमत 500 से एक हजार करोड़ रूपये तक हो सकती है। इस जमीन के पीछे ही परकोटे में संजय बाजार की बसावट की गई है।
सूत्र बताते हैं कि अजमेरी गेट से सांगानेरी गेट तक परकोटे और एमआई रोड़ के बीच बने पॉश कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों की तरह सांगानेरी गेट से घाटगेट तक अगर कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों को भू-आवंटन सरकार/नगर निगम करे तो सरकारी खजाने में पांच हजार करोड़ रूपये का राजस्व आ सकता है। यही कारण है कि जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व के अफसरों और कारिंदों की मिलीभगत से अवैध व्यवसायिक निर्माण युद्धस्तर पर धड़ल्ले से बिना किसी रोकटोक के किये जा रहे हैं।
अब देखना है कि जयपुर नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लालचंद असवाल और उनके मातहत अफसरों की फौज की आंखें कब खुलती है या फिर नोटों की गड्डियों के बीच दबकर बंद होती है!
जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व क्षेत्र के आगरा रोड़ अग्रवाल कॉलेज और संजय मार्केट (परकोटे) के बीच सरकार ने मिश्रा मार्केट के नाम से मार्केट बना कर ट्रांसपोर्ट काम में जुटे तकनीकी लोगों को बसाया था, बाद में वर्ष 1993 तक क्रमबद्ध तरीके से इन लोगों को आगरा रोड़ ट्रांसपोर्ट नगर और दिल्ली बाईपास रोड़ पर पुनर्वासित कर दिया गया। इसके चलते मिश्रा मार्केट खाली हो गया और करोड़ों रूपये की इस खाली जमीन पर लोगों ने अतिक्रमण और अवैध कब्जे कर अनधिकृत निर्माण करने शुरू कर दिये। लेकिन अब जयपुर नगर निगम के अफसरों और कारिंदों की मिलीभगत से इन गैरकानूनी बिना इजाजत तामीर अवैध कॉमर्शियल निर्माण करने वाले भूमाफियाओं ने अब खुले आम सरकारी जमीन पर कॉमर्शियल निर्माण कर बेचने का गोरखधंधा भी चालू कर दिया है।
जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व के आयुक्त भी मानते हैं कि मिश्रा मार्केट क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण की इजाजत नहीं दी गई है! सूचना का अधिकार कानून के तहत मिश्रा मार्केट से सम्बन्धित मांगी गई सूचना के जवाब में वे लिखते हैं कि ''हवामहल जोन (पूर्व) कार्यालय द्वारा निर्माण की स्वीकृति नहीं दी गई है। जिसके कारण कोई कार्यवाही नहीं की गई है।" अब इन आयुक्त महोदय को कौन समझाये कि जब निर्माण के लिये स्वीकृति उनके स्तर से नहीं दी गई है तो फिर बिना इजाजत तामीर हो रहे निर्माणों के खिलाफ राजस्थान नगर पालिका अधिनियम की धारा 194 और 245 के तहत कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है?
सूत्रों ने अग्रगामी संदेश को बताया कि मिश्रा मार्केट और उसके आसपास अधिकांश जमीन सरकारी स्वामित्व की है और इस जमीन की कीमत 500 से एक हजार करोड़ रूपये तक हो सकती है। इस जमीन के पीछे ही परकोटे में संजय बाजार की बसावट की गई है।
सूत्र बताते हैं कि अजमेरी गेट से सांगानेरी गेट तक परकोटे और एमआई रोड़ के बीच बने पॉश कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों की तरह सांगानेरी गेट से घाटगेट तक अगर कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों को भू-आवंटन सरकार/नगर निगम करे तो सरकारी खजाने में पांच हजार करोड़ रूपये का राजस्व आ सकता है। यही कारण है कि जयपुर नगर निगम के हवामहल जोन पूर्व के अफसरों और कारिंदों की मिलीभगत से अवैध व्यवसायिक निर्माण युद्धस्तर पर धड़ल्ले से बिना किसी रोकटोक के किये जा रहे हैं।
अब देखना है कि जयपुर नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लालचंद असवाल और उनके मातहत अफसरों की फौज की आंखें कब खुलती है या फिर नोटों की गड्डियों के बीच दबकर बंद होती है!


