जयपुर (अग्रगामी) आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर चुनाव आयोग द्वारा देश में चुनावी आचार संहिता मार्च के प्रथम सप्ताह में किसी भी समय लागू की जा सकती है। आचार संहिता लगने के बाद प्रशासन में चुनावी खुमारी चढ़ जायेगी और आम अवाम को दरकिनार कर उनके छोटे मोटे रोजमर्रा के कामकाज को भी चुनावी आचार संहिता लागू होने की आड़ लेकर नकारने की प्रवृति शासन में बैठे हुक्कामों में ठूंस-ठूंस कर भर जायेगी।
राजस्थान में आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजस्थान प्रशासनिक सेवाओं के छह सौ से ज्यादा और राजस्थान पुलिस सेवा के लगभग चार सौ से ज्यादा अफसरों को बदल दिया गया है।
वसुन्धरा राजे द्वारा राजस्थान के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के तबादलों का दौर शुरू हो गया था, जो आज तक नहीं थमा है। लेकिन इसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के टापब्राज राजस्थान में मिशन-25 की कामयाबी पर प्रश्रचिन्ह की मुद्रा में हैं!
सूत्र बताते हैं कि राजस्थान में मिशन-25 की कामयाबी के लिये भाजपा की दिखावटी तौर पर फीडबैक लेने की कवायद चल रही है, जबकि अंदरखाने लगभग पंद्रह-सोलह उम्मीदवारों का चयन हो चुका है। वहीं लगभग दस सीटों के लिये भाजपा को उम्मीदवार ही नजर नहीं आ रहे हैं। राजस्थान विधानसभा चुनावों में 163 सीटों के साथ दो तिहाई बहुमत जुटाने वाली राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ समर्थित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के एकला चालो अभियान से पार्टी के वरिष्ठ नेता सख्त नाराज हैं, लेकिन पार्टी अनुशासन से बंधे होने के कारण वे अपनी जबान नहीं खोलने पर विवश है।
नतीजन आगामी लोकसभा चुनावों में राजस्थान में भाजपा की मिशन-25 की कमान पूर्णत: राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हाथ में ही रहेगी और संघ की राजस्थान में कमान खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सम्भाल रखी है।
अगर कांग्रेसी खेमे की बात की जाये तो राजस्थान विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेसी नेताओं का मनोबल इस कदर टूट गया है कि वे पार्टी कार्यकार्ताओं के बीच जाने से ही कतरा रहे हैं। विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ती ही जा रही है, नतीजन लोकसभा चुनावों से सम्बन्धित फैसले दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान को लेने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में व्याप्त निराशा और नेताओं के स्तर पर हो रही उठापटक का भरपूर फायदा उठाने के लिये राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अभी से पुख्ता योजना बनाना शुरू कर दिया है।
उधर आम आदमी पार्टी की हकीकत भी उजागर होती ही चली जा रही है। आप ऊपरी तौर पर भाजपा और कांग्रेस को अपना विरोधी मानती है। दोनों ही पार्टियों को अंबानी बंधुओं का बंधुआ बता रही है। वहीं भाजपा पूरे जोशोखरोश के साथ आम आदमी पार्टी का विरोध कर रही है। लेकिन हकीकत इससे अलग है। आम आदमी पार्टी दिखावे के लिये तो भाजपा और अंबानी बंधुओं का विरोध कर रही है, लेकिन वास्तव में वह सिर्फ कांग्रेस के पीछे हाथ धोकर पड़ी है। आम आदमी पार्टी ने आज तक लोकसभा के लिये जितने भी उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, उनमें से अधिकांश को आप ने कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ मैदान में उतारा है। आज तक भाजपा के एक भी लोकसभा उम्मीदवार के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने अपना उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है। इससे साफ जाहिर होता जा रहा है कि आप और भाजपा में अंदरूनी सांठगांठ है और ऊपरी तौर पर दोनों नूराकुश्ती में जुटे हैं।
उधर राजस्थान में तीसरे मोर्चे की हालत वैसे ही पतली है, लेकिन ग्यारह पार्टियों के इस बेमेल मोर्चे के आकाओं में भी आपसी तालमेल नहीं है। सभी पार्टियों के नेताओं में व्यक्तिगत हित साधन के चलते अहम जिस कदर भरा है, लगता नहीं है कि वे मिल बैठ कर कोई रणनीति बना पायेंगे अगर हकीकत में इन पार्टियों के नेता एक मंच पर आ जायें तो राज्य की चार सीटों पर वे कड़ी टक्कर दे सकते हैं।
राजस्थान में आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजस्थान प्रशासनिक सेवाओं के छह सौ से ज्यादा और राजस्थान पुलिस सेवा के लगभग चार सौ से ज्यादा अफसरों को बदल दिया गया है।
वसुन्धरा राजे द्वारा राजस्थान के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के तबादलों का दौर शुरू हो गया था, जो आज तक नहीं थमा है। लेकिन इसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के टापब्राज राजस्थान में मिशन-25 की कामयाबी पर प्रश्रचिन्ह की मुद्रा में हैं!
सूत्र बताते हैं कि राजस्थान में मिशन-25 की कामयाबी के लिये भाजपा की दिखावटी तौर पर फीडबैक लेने की कवायद चल रही है, जबकि अंदरखाने लगभग पंद्रह-सोलह उम्मीदवारों का चयन हो चुका है। वहीं लगभग दस सीटों के लिये भाजपा को उम्मीदवार ही नजर नहीं आ रहे हैं। राजस्थान विधानसभा चुनावों में 163 सीटों के साथ दो तिहाई बहुमत जुटाने वाली राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ समर्थित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के एकला चालो अभियान से पार्टी के वरिष्ठ नेता सख्त नाराज हैं, लेकिन पार्टी अनुशासन से बंधे होने के कारण वे अपनी जबान नहीं खोलने पर विवश है।
नतीजन आगामी लोकसभा चुनावों में राजस्थान में भाजपा की मिशन-25 की कमान पूर्णत: राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हाथ में ही रहेगी और संघ की राजस्थान में कमान खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सम्भाल रखी है।
अगर कांग्रेसी खेमे की बात की जाये तो राजस्थान विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेसी नेताओं का मनोबल इस कदर टूट गया है कि वे पार्टी कार्यकार्ताओं के बीच जाने से ही कतरा रहे हैं। विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ती ही जा रही है, नतीजन लोकसभा चुनावों से सम्बन्धित फैसले दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान को लेने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में व्याप्त निराशा और नेताओं के स्तर पर हो रही उठापटक का भरपूर फायदा उठाने के लिये राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अभी से पुख्ता योजना बनाना शुरू कर दिया है।
उधर आम आदमी पार्टी की हकीकत भी उजागर होती ही चली जा रही है। आप ऊपरी तौर पर भाजपा और कांग्रेस को अपना विरोधी मानती है। दोनों ही पार्टियों को अंबानी बंधुओं का बंधुआ बता रही है। वहीं भाजपा पूरे जोशोखरोश के साथ आम आदमी पार्टी का विरोध कर रही है। लेकिन हकीकत इससे अलग है। आम आदमी पार्टी दिखावे के लिये तो भाजपा और अंबानी बंधुओं का विरोध कर रही है, लेकिन वास्तव में वह सिर्फ कांग्रेस के पीछे हाथ धोकर पड़ी है। आम आदमी पार्टी ने आज तक लोकसभा के लिये जितने भी उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, उनमें से अधिकांश को आप ने कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ मैदान में उतारा है। आज तक भाजपा के एक भी लोकसभा उम्मीदवार के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने अपना उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है। इससे साफ जाहिर होता जा रहा है कि आप और भाजपा में अंदरूनी सांठगांठ है और ऊपरी तौर पर दोनों नूराकुश्ती में जुटे हैं।
उधर राजस्थान में तीसरे मोर्चे की हालत वैसे ही पतली है, लेकिन ग्यारह पार्टियों के इस बेमेल मोर्चे के आकाओं में भी आपसी तालमेल नहीं है। सभी पार्टियों के नेताओं में व्यक्तिगत हित साधन के चलते अहम जिस कदर भरा है, लगता नहीं है कि वे मिल बैठ कर कोई रणनीति बना पायेंगे अगर हकीकत में इन पार्टियों के नेता एक मंच पर आ जायें तो राज्य की चार सीटों पर वे कड़ी टक्कर दे सकते हैं।


