जयपुर (अग्रगामी) राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार आगामी 19 फरवरी तक भरतपुर सम्भाग में रह कर राजस्थान का राजकाज चलायेगी। हालांकि आगामी लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा के मिशन 25 के तहत राजस्थान से लोकसभा की सभी पच्चीस सीटों को जीतने की जुगत बैठाने के चक्कर में पूरे प्रदेश में प्रशासन पटरी से उतर गया है। आम अवाम से लेकर अवाम के चुनिंदा जनप्रतिनिधियों की शिकायतों पर प्रदेश में सत्ता की बागड़ोर सम्भाले हुए मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ओर उनके मंत्रिमण्डल के सहयोगियों का एक ही रटा रटाया जवाब सुनने को मिल रहा है कि अभी आप लोग मिशन 25 को सफल बनाने में जुट जायें! आपकी समस्याओं का समाधान लोकसभा चुनावों के बाद किया जायेगा।
एक ओर भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की अरविंद केजरीवाल सरकार के पीछे नहा-धोकर पड़ी है और पानी पी-पी कर कोस रही है और काम नहीं करने के बेतुके आरोप लगा कर उसे सत्ता से हटाने की पुरजोर कोशिश कर रही है वहीं राजस्थान में भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार अपनी ही पार्टी के चुनिंदा जनप्रतिनिधियों तक को साफ-साफ जवाब दे रही है कि उनकी शिकायतों तक पर भी कार्यवाही लोकसभा चुनावों के बाद ही होगी। आम अवाम की दु:ख तकलीफों को दूर करने के मुद्दे पर भी भाजपाईयों और उनकी वसुन्धरा राजे सरकार का एक ही कथन है कि पहिले मिशन 25 के तहत राजस्थान से लोकसभा की सभी सीटें जिताओ उसके बाद अपने दु:खदर्दों का इलाज करवाना!
दुरंगे झण्डे वाली इस पार्टी का दिल्ली और राजस्थान में दुरंगा रंग साफ-साफ देखने को मिल रहा है। शर्मनाक स्थिति यह है कि दिल्ली प्रदेश भाजपा के नेता विजय गोयल को राजस्थान से राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित करवाया गया था और अपेक्षा थी कि वे राजस्थान के अवाम के हित में नये सिरे से काम करेंगे। लेकिन गोयल साहब भी राजस्थान से राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित होते ही दिल्ली प्रदेश भाजपा के नेताओं के साथ एकजुट होकर दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को कोसने में जुट गये हैं। दिल्ली राज्य और राजस्थान में भाजपा का दुरंगा रंग तो सामने आ ही गया है, लेकिन एक ओर पीड़ादायक स्थिति राजस्थान में पैदा हो गई है।
राजस्थान विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता अपने दड़बों में पड़े घावों को सहला रहे नजर आ रहे हैं। अशोक गहलोत हों या फिर डॉ.चंद्रभान, वे आज इस स्थिति में नहीं हैं कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच जाये और पस्त पार्टी कार्यकर्ताओं से मिले और उनकी हौंसला अफजाई करें। कारण साफ है कि बार-बार चेतावनी के बाद अशोक भाई ने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नजरन्दाज कर अपनी राठौड़ी चलाई। नतीजन कांग्रेस का आम कार्यकर्ता अपनी अनदेखी होते देख चुनावी समर से किनारा करता ही चला गया और उसे पलायन करते नेतागण देखते रहे, क्योंकि उन्हें वापस मुख्यधारा में लाने की किसी भी पार्टी लीडर में हिम्मत-हौंसला था ही नहीं।
अशोक भाईजी ने पत्रकारों में अपनी पैठ जमाने के लिये पत्रकारों को पेंशन की सौगात दी, उन्हें लैपटाप बांटे। पत्रकारों को पेंशन का मामला आज तक सूचना और जनसम्पर्क विभाग में बाबुओं के जूतों के नीचे पड़ा अंतिम सांस गिन रहा है। लैपटाप के वितरण की नौटंकी देखिये। जिन अखबारों की सौ कापी भी नहीं छपती उन अखबारों के एक ही परिवार के तीन-तीन लोगों को सूचना और जनसम्पर्क विभाग के भ्रष्ट और रिश्वतखोर अफसरों और कारिंदों की मिलीभगत से तीन-तीन लैपटाप इनायत कर दिये गये। अब गहलोत भाईजी ही बतायें कि उन्हें इसका क्या फायदा मिला। हां! यह तो साफ हो गया कि अगर जिला स्तरीय अवाम से जुड़े छोटे अखबारों से कांग्रेस पार्टी का जुड़ाव होता, सरकारी प्रोत्साहन होता तो निश्चित ही उन्हें फायदा पहुंचा होता। क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को आज की परिस्थिति में भी छोटे साप्ताहिक/पाक्षिक अखबार ही सीधी टक्कर देने की स्थिति में है नतीजन आरएसएस तथा भाजपा इन्हें कुचलने में जुटे हैं।
दु:खद स्थिति यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी जनवादी पार्टियों के आका धर्मान्ध और हिन्दुत्ववादी पार्टियों से मुकाबला करने और केंद्र में भाजपा-कांग्रेस का विकल्प तैयार करने में जुटे हैं, लेकिन प्रादेशिक स्तर पर इन पार्टियों में कोई तालमेल नजर नहीं आता है। कर्मठ कार्यकर्ता (कामरेड़) शांत बैठे हैं वहीं माकपा, भाकपा और फारवर्ड ब्लाक में साफ-साफ तालमेल का अभाव है। जनता दल सेक्यूलर सहित अधिकांश दलों का राजस्थान में कोई वजूद नहीं है। लेकिन दोनों वामदल वजूद विहीन पार्टियों को मरे सांप की तरह गले में लटका कर घूम रहे हैं! उधर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रदेश में अपनी ताकत बढ़ाने और उसके प्रदर्शन में अपनी पूरी ताकत झौंक रहा है।
यह सही वक्त है कि सभी निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियां एकजुट होकर राजस्थान में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा का सशक्त तरीके से मुकाबला करने के लिये साझा रणनीति बना कर उस पर ईमानदारी से अमल करें।
एक ओर भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की अरविंद केजरीवाल सरकार के पीछे नहा-धोकर पड़ी है और पानी पी-पी कर कोस रही है और काम नहीं करने के बेतुके आरोप लगा कर उसे सत्ता से हटाने की पुरजोर कोशिश कर रही है वहीं राजस्थान में भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार अपनी ही पार्टी के चुनिंदा जनप्रतिनिधियों तक को साफ-साफ जवाब दे रही है कि उनकी शिकायतों तक पर भी कार्यवाही लोकसभा चुनावों के बाद ही होगी। आम अवाम की दु:ख तकलीफों को दूर करने के मुद्दे पर भी भाजपाईयों और उनकी वसुन्धरा राजे सरकार का एक ही कथन है कि पहिले मिशन 25 के तहत राजस्थान से लोकसभा की सभी सीटें जिताओ उसके बाद अपने दु:खदर्दों का इलाज करवाना!
दुरंगे झण्डे वाली इस पार्टी का दिल्ली और राजस्थान में दुरंगा रंग साफ-साफ देखने को मिल रहा है। शर्मनाक स्थिति यह है कि दिल्ली प्रदेश भाजपा के नेता विजय गोयल को राजस्थान से राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित करवाया गया था और अपेक्षा थी कि वे राजस्थान के अवाम के हित में नये सिरे से काम करेंगे। लेकिन गोयल साहब भी राजस्थान से राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित होते ही दिल्ली प्रदेश भाजपा के नेताओं के साथ एकजुट होकर दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को कोसने में जुट गये हैं। दिल्ली राज्य और राजस्थान में भाजपा का दुरंगा रंग तो सामने आ ही गया है, लेकिन एक ओर पीड़ादायक स्थिति राजस्थान में पैदा हो गई है।
राजस्थान विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता अपने दड़बों में पड़े घावों को सहला रहे नजर आ रहे हैं। अशोक गहलोत हों या फिर डॉ.चंद्रभान, वे आज इस स्थिति में नहीं हैं कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच जाये और पस्त पार्टी कार्यकर्ताओं से मिले और उनकी हौंसला अफजाई करें। कारण साफ है कि बार-बार चेतावनी के बाद अशोक भाई ने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नजरन्दाज कर अपनी राठौड़ी चलाई। नतीजन कांग्रेस का आम कार्यकर्ता अपनी अनदेखी होते देख चुनावी समर से किनारा करता ही चला गया और उसे पलायन करते नेतागण देखते रहे, क्योंकि उन्हें वापस मुख्यधारा में लाने की किसी भी पार्टी लीडर में हिम्मत-हौंसला था ही नहीं।
अशोक भाईजी ने पत्रकारों में अपनी पैठ जमाने के लिये पत्रकारों को पेंशन की सौगात दी, उन्हें लैपटाप बांटे। पत्रकारों को पेंशन का मामला आज तक सूचना और जनसम्पर्क विभाग में बाबुओं के जूतों के नीचे पड़ा अंतिम सांस गिन रहा है। लैपटाप के वितरण की नौटंकी देखिये। जिन अखबारों की सौ कापी भी नहीं छपती उन अखबारों के एक ही परिवार के तीन-तीन लोगों को सूचना और जनसम्पर्क विभाग के भ्रष्ट और रिश्वतखोर अफसरों और कारिंदों की मिलीभगत से तीन-तीन लैपटाप इनायत कर दिये गये। अब गहलोत भाईजी ही बतायें कि उन्हें इसका क्या फायदा मिला। हां! यह तो साफ हो गया कि अगर जिला स्तरीय अवाम से जुड़े छोटे अखबारों से कांग्रेस पार्टी का जुड़ाव होता, सरकारी प्रोत्साहन होता तो निश्चित ही उन्हें फायदा पहुंचा होता। क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को आज की परिस्थिति में भी छोटे साप्ताहिक/पाक्षिक अखबार ही सीधी टक्कर देने की स्थिति में है नतीजन आरएसएस तथा भाजपा इन्हें कुचलने में जुटे हैं।
दु:खद स्थिति यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी जनवादी पार्टियों के आका धर्मान्ध और हिन्दुत्ववादी पार्टियों से मुकाबला करने और केंद्र में भाजपा-कांग्रेस का विकल्प तैयार करने में जुटे हैं, लेकिन प्रादेशिक स्तर पर इन पार्टियों में कोई तालमेल नजर नहीं आता है। कर्मठ कार्यकर्ता (कामरेड़) शांत बैठे हैं वहीं माकपा, भाकपा और फारवर्ड ब्लाक में साफ-साफ तालमेल का अभाव है। जनता दल सेक्यूलर सहित अधिकांश दलों का राजस्थान में कोई वजूद नहीं है। लेकिन दोनों वामदल वजूद विहीन पार्टियों को मरे सांप की तरह गले में लटका कर घूम रहे हैं! उधर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रदेश में अपनी ताकत बढ़ाने और उसके प्रदर्शन में अपनी पूरी ताकत झौंक रहा है।
यह सही वक्त है कि सभी निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियां एकजुट होकर राजस्थान में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा का सशक्त तरीके से मुकाबला करने के लिये साझा रणनीति बना कर उस पर ईमानदारी से अमल करें।


