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लोकसभा चुनावों तक जमाखोरों-कालाबाजारियों पर अंकुश नामुमकिन!

राजस्थान विधानसभा ने पिछले दिनों ही राज्य में राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक 2014 पारित किया। इस से पूर्व आवश्यक उपभोक्ता वस्तु अधिनियम 1955 भी राज्य में लागू है। दोनों ही कानूनों के तहत प्रदेश में जमाखोरी-कालाबाजारी रोकने के लिये राज्य सरकार के पास व्यापक अधिकार हैं। लेकिन पूरी तरह अधिकारों से लैस होने के बावजूद सरकार प्रदेश की जनता को मंहगाई से निजात दिलाने के लिये कालाबाजारियों-जमाखोरों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर रही है। प्रदेश में जमाखोरी चरम पर है। कृषि जिंसों का उत्पादन सही दिशा में है और मांग तथा उत्पादन में सामजस्य होने के बावजूद कालाबाजारियों की अनियन्त्रित जमाखोरी ने प्रदेश में उपभोक्ता वस्तुओं में कमी का माहौल बना रखा है। ये जमाखोर कालाबारिये बदल-बदल कर जिंसों के अभाव की स्थिति पैदा कर ऊंचे दामों में बेचते हैं, नतीजन मंहगाई बढ़ती है और उसकी गाज आम आदमी खास कर गरीब पर पड़ती है।
अगर सूत्रों की माने तो आगामी लोकसभा चुनावों तक राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार जमाखोरों-कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर कोई सख्त कार्यवाही करने के मूड में नहीं लगती है।
राज्य में जो नया कानून, राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक 2014 लागू हुआ है, उसे भी सिर्फ बजरी वितरण विनियमन में ही लागू किया जा रहा है। हालांकि इस कानून के लागू होने के बाद भी बजरी की कीमतों में कोई खास कमी नजर नहीं आ रही है।
भारतीय जनता पार्टी की वसुन्धरा राजे सरकार को प्रदेश की सत्ता सम्भाले हुए दो महिनों से अधिक होने वाले हैं, लेकिन सरकार लोकसभा चुनावों के अपने मिशन-25 से आगे एक कदम भी नहीं बढ़ रही है। वसुन्धरा राजे सरकार के मंत्रिमण्डल के सहयोगियों का भी भाजपा के चुनिंदा जनप्रतिनिधियों और अवाम को एक ही संदेश है कि उनके जो भी काम हैं उन पर लोकसभा चुनावों के बाद ही कार्यवाही सम्भव होगी और तब तक सभी को मिशन-25 को सफल बनाने में जुट जाना चाहिये।
वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में भाजपा सरकार की यह स्थिति साफ-साफ दर्शाती है कि चुनावी चंदे के फेर में भाजपा और उसकी वसुन्धरा राजे सरकार जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों के खिलाफ कोई कार्यवाही करने की रिस्क नहीं लेना चाहती है। अगर वह जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर छापेमारी करती है तो उसे इस तबके से मिलने वाले चुनावी चंदे से महरूम होना पड़ेगा, जबकि मतदाता को वोट तो देना ही पड़ेगा, चाहे वह मजबूरी में ही दे।

 
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