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कहां है वसुन्धरा राजे सरकार का प्रशासन, बतायें आरएसएस पंथी भाजपाई नेता!

जयपुर (अग्रगामी) राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी का नात्सीवादी सामन्तवादी चेहरा उजागर होता ही जा रहा है। एक तरफ देश की राजधानी दिल्ली में वह जिन मुद्दों पर आम आदमी पार्टी की अरविंद केजरीवाल सरकार को घेरने में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है वहीं दूसरी ओर राजस्थान में उन्हीं मुद्दों पर राजस्थान की भाजपाई वसुन्धरा राजे सरकार आम अवाम की घोर अवहेलना कर रही है। दिल्ली में केजरीवाल प्रशासन ने बिजली सस्ती करने और 700 लीटर पानी मुफ्त मुहैया करवाने की जो मुहिम चलाई, वह भाजपाई नेताओं को रास नहीं आई और अब कारपोरेट कम्पनियों टाटा और अम्बानी ग्रुप के साथ लगे हैं दिल्ली की केजरीवाल सरकार को पटखनी लगाने में! यही नहीं दिल्ली में सत्ता हथियाने की डॉ.हर्षवर्धन की नौटंकी को मजबूती दिलवाने के लिये विजय गोयल को राजस्थान से राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित करवा दिया गया। जबकि राजस्थान के अवाम की समस्याओं और राजस्थान की राजनीति से विजय गोयल का दूर तक का नाता नहीं है।
राजस्थान में वसुन्धरा राजे द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के डेढ़ महिना बीत जाने के बाद भी जनता मंहगाई से गहराई तक त्रस्त है। सरकार बहानेबाजी का सहारा लेकर जमाखोरों, कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही करने से बच रही है। क्योंकि ऐसा करने से जमाखोरों, कालाबाजारियों से भारतीय जनता पार्टी को मोटा चुनावी चंदा जो मिलता है।
सूत्र बताते हैं कि अकेले राजस्थान में लगभग 6 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की उपभोक्ता जिंसो जमाखोरों के गोदामों में भरी पड़ी है और ये जमाखोर इनके बूते पर उपभोक्ता सामग्री का अभाव पैदा कर कालाबाजारी करते हैं। लेकिन सत्ताधीश इन की करतूतों पर कानून का हथौड़ा चलाने के बजाय पिछले दरवाजे से इन्हें मदद ही कर रहे है। जनता जाये भाड़ में! जनता सिर्फ वोट देती है, लेकिन वोटरों को इकठ्ठा करने और प्रचार-प्रसार के लिये नोटों की गड्डियां तो जमाखोरों-कालाबाजारियों, भूमाफियाओं और बड़े-बड़े पूंजीपतियों से ही आनी हैं। ऐसे में इन पर कार्यवाही कैसे हो सकती है?
वसुन्धरा राजे सरकार की केबीनेट की बैठक भरतपुर में आयोजित की गई है। आगामी 20 फरवरी तक राज्य की सरकार भरतपुर में डेरा डाले रहेगी। वहीं भरतपुर से लौटी थकी-हारी सरकार जयपुर आकर लगभग एक सप्ताह विश्राम में चली जायेगी। सरकार भरतपुर में और हुक्कामों-कारिंदों का लवाजमा कैम्पों में! अब कौन सुनेगा राजस्थान के आम अवाम के दु:खदर्द? पीडि़त जब अपनी शिकायत लेकर जुम्मेदार अफसर के पास जायेगा तो एक ही जवाब मिलेगा कि वह कैम्पों में या सरकार की केबीनेट मीटिंग में व्यस्त हैं। अपनी तकलीफों को दूर करने के लिये सुनवाई हेतु अगले महिने आना! अब भाजपाई आलाकमान से लेकर प्रदेश के सभी नेतागण सोचें और मनन करें कि क्या इस ही को कहते हैं गुड गवर्नेंस?
राजस्थान, खास कर राजधानी में अपराधों और अपराधियों का ग्राफ ऊपर की ओर जा रहा है। पुलिस के कुछ टापब्रास को इधर-उधर कर दिया गया है। उधर नई-नई कुर्सी सम्भालने वाले अफसरों को 60 दिवसीय कार्ययोजना का झुंझुना थमा दिया गया है। वे इस 60 दिवसीय कार्ययोजना का झुंझुना बजाते रहेंगे और अपराधों का ग्राफ ऊंचा चढ़ता रहेगा। शायद मैडम जी की सरकार की गुडगवर्नेंस का यह भी एक पहलू है।
वसुन्धरा राजे की सरकार को दो तिहाई से ज्यादा बहुमत के साथ सत्तासीन करने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का महत्वपूर्ण रोल रहा है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा जिस तरह से राज्य के विधानसभा चुनावों में अपना रोल अदा किया गया वह काबिले तारीफ है। आरएसएस अपने इस रोल से उत्सासित है ओर राजस्थान में अपने संगठन को ज्यादा ताकतवर करने में जुटा है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आकाओं को साफ हो गया है कि कांग्रेस का यूथ संगठन युवा कांग्रेस और कांग्रेस सेवादल उनकी पार्टी के लिये सफेद हाथी से ज्यादा कुछ नहीं है। पिछले विधानसभा चुनावों में इन संगठनों और इनके पदाधिकारियों की कार्यक्षमता की हकीकत सामने आ गई! वहीं जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के कांग्रेसी नेता सिरफुटव्वल में इस कदर उलझ गये हैं कि उन्हें यह भी सोचने की फुर्ससत नहीं है कि चुनावों में पार्टी की आबरू बचाने के लिये क्या जुगत बैठाई जाये।
राजस्थान में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रसार को रोकने के लिये कैडर बेस्ड़ पार्टियां ही सक्षम रही है। वामपंथी जनवादी पार्टियां कैडर बेस्ड़ पार्टियां है। राष्ट्रीय स्तर के चार वामपंथी जनवादी दलों माकपा, फारवर्ड ब्लाक, भाकपा और आरएसपी में से तीन माकपा, फारवर्ड ब्लाक और भाकपा का वजूद राजस्थान में है। जब तक इन पार्टियों ने अन्य वामपंथियों के साथ जनसंघर्ष के लिये मैदान सम्भाले रखा, तब तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ राज्य में एक सीमित दायरे में रहा, लेकिन जैसे ही वामपंथी जनवादी दल अवाम से कटने लगे, आरएसएस का प्रभाव बढऩे लगा। आज राजस्थान में वामपंथी जनवादी दल हांशिये पर आ गये हैं। इन दलों के नेताओं के अहंकार के चलते आपसी एकता में दरार और अवाम से बढ़ी दूरी ने इन दलों की अवाम में रही प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया है। अपनी इन गलतियों को आज भी इन दलों के नेता सुधारने का मानस नहीं बना पाये हैं। नतीजन इनकी सिरफुटव्वल का फायदा आरएसएस और भाजपा को मिल रहा है।
कुल मिला कर वामजनवादी पार्टियों की कमजोरियों और कांग्रेस तथा अन्य राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पार्टियों, नेताओं की अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग से अति उत्साहिक भाजपा मिशन-25 में जुटी है। भाजपा और उसकी वसुन्धरा राजे सरकार मिशन-25 के मायाजाल में इतनी उलझ गई है कि उसने आम अवाम खास कर अवाम के पिछड़े और गरीब, शोषित और पीडि़त वर्ग के दु:खदर्दों को लगभग नजरन्दाज कर दिया है। मंहगाई, जमाखारी, कालाबाजारी अपने चरम पर है। बेरोजगारी जिन्न की तरह मुंह फैलाये खड़ी है। भ्रष्टाचार-अनाचार के रेकार्ड टूटते नजर आ रहे हैं। भूमाफिया और बिल्डर माफिया खुले आम कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। वसुन्धरा राजे राज का प्रशासन ऐसे हालात में नजर आ रहा है, जैसे सन्नीपात में जकड़ा अकड़ा पड़ा हो!

 
AGRAGAMI SANDESH

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