जैन समुदाय के अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा देने का केंद्रीय मंत्रिमण्डल ने फैसला ले लिया है और अब इस प्रकरण में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय द्वारा अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया चल रही है।
राजस्थान के श्वेताम्बर समाज में खरतरगच्छ जन चेतना मंच के प्रमुख कार्यकारी कार्यकर्ता हीराचंद जैन जो कि ऑल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक के राजस्थान स्टेट जनरल सेक्रेटरी हैं और बंधुआ मुक्ति मोर्चा राजस्थान के पूर्व अध्यक्ष एवं राजस्थान अग्रगामी पत्रकार परिषद् के पूर्व संयोजक रहे हैं और इससे पूर्व जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रन्ट से भी अर्से तक जुड़ रहे हैं, एक ऐसे संघर्षशील व्यक्तित्व रहे हैं, जो लगातार पिछले 20 सालों से जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिये जाने के लिये संघर्ष करते रहे। एक ओर उमरावमल चौरडिय़ा जहां श्वेताम्बर जैन समुदाय को एकजुट करने के लिये जुझारू व्यक्तित्व की तरह उभरे और जयपुर में श्री जैन श्वेताम्बर संघ की बुनियाद डालने और उसे गतिशील करने में उनका योगदान नहीं भुलाया सकता है, उसी तरह हीराचंद जैन का जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये किये गये दायीत्वपूर्ण कर्तव्यनिर्वहन भी हमारा मार्गदर्शक है।
चाहे उमरावमल चौरडिय़ा हों, या फिर हीराचंद जैन, इनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर हम काफी कुछ लिखने की स्थिति में हैं। लेकिन क्या श्वेताम्बर जैन समुदाय इनके समाज के प्रति मौन दायीत्व निर्वहन से सबक लेगा! राजनैतिक शुचिता के मामले में हम आम आदमी पार्टी से उदाहरण प्राप्त करते हैं, लेकिन सामाजिक शुचिता, सामाजिक चेतना, समाज को संगठित करने और समाज में आचरण शुद्धि के कार्यक्रम चलाने के बारे में हमारे समाज के अगड़ों को इनके कृतित्व और व्यक्तित्व से सबक लेने में क्यों शर्म आती है! भीनमाल साधु प्रकरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत का विधानसभा के भीतर और बाहर घेराव हो, अलवर दीक्षा प्रकरण हो या फिर जैन साधु-साध्वियों पर कट्टर हिन्दुत्ववादियों के हमले हों, इनके मार्गदर्शन में जैन समुदाय ने अपनी ताकत का अहसास सत्ताधीशों को कराया था।
राजस्थान में पत्थर खदानों, ईंट भट्टों से बंधुआ मजदूरों की मुक्ति और उनके पुनर्वास तथा दिवराला सती प्रकरण जैसे गम्भीर मुद्दों को लेकर संगठित अभियान चलाने वाले जुझारू व्यक्तित्व हीराचंद जैन राष्ट्रीय एवं अन्र्तराष्ट्रीय परिचय के मोहताज नहीं हैं।
श्वेताम्बर जैन समुदाय के हिन्दुत्ववादी अवसरवादी पूंजीपति-धनाढ्य वर्ग नहीं चाहता है कि चौरडिय़ा जी या जैन साहब जैसे अपने कृतित्व और व्यक्तित्व के धनी लोग समाज के आगेवान बने! क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनकी जमी जमाई दुकानदारियां खत्म हो जायेंगी।
लेकिन जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने हेतु केंद्रीय मंत्रिमण्डल की मंजूरी जैन समुदाय की उन्नति के लिये मील का पत्थर साबित होगा। जैन समुदाय के युवकों की सेठों पर आश्रित होने की मजबूरी खत्म होगी। शिक्षा, रोजगार, समाज कल्याण, जैन इतिहास लेखन, जैन सांस्कृतिक अकादमी के गठन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को प्रारम्भ करने के रास्ते खुलेंगे। हमारा उमरावमल चौरडिय़ा, हीराचंद जैन और इन जैसे ही अन्य समाजसेवियों से आग्रह है कि अपने गुमनामी के आवरण को उतारें और सशक्त रूप से समाज को संगठित करने का नये सिरे से प्रयास करें।
हम उन सभी समाज बन्धुओं के शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलाने में अपना प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष योगदान दिया।
राजस्थान के श्वेताम्बर समाज में खरतरगच्छ जन चेतना मंच के प्रमुख कार्यकारी कार्यकर्ता हीराचंद जैन जो कि ऑल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक के राजस्थान स्टेट जनरल सेक्रेटरी हैं और बंधुआ मुक्ति मोर्चा राजस्थान के पूर्व अध्यक्ष एवं राजस्थान अग्रगामी पत्रकार परिषद् के पूर्व संयोजक रहे हैं और इससे पूर्व जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रन्ट से भी अर्से तक जुड़ रहे हैं, एक ऐसे संघर्षशील व्यक्तित्व रहे हैं, जो लगातार पिछले 20 सालों से जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिये जाने के लिये संघर्ष करते रहे। एक ओर उमरावमल चौरडिय़ा जहां श्वेताम्बर जैन समुदाय को एकजुट करने के लिये जुझारू व्यक्तित्व की तरह उभरे और जयपुर में श्री जैन श्वेताम्बर संघ की बुनियाद डालने और उसे गतिशील करने में उनका योगदान नहीं भुलाया सकता है, उसी तरह हीराचंद जैन का जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये किये गये दायीत्वपूर्ण कर्तव्यनिर्वहन भी हमारा मार्गदर्शक है।
चाहे उमरावमल चौरडिय़ा हों, या फिर हीराचंद जैन, इनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर हम काफी कुछ लिखने की स्थिति में हैं। लेकिन क्या श्वेताम्बर जैन समुदाय इनके समाज के प्रति मौन दायीत्व निर्वहन से सबक लेगा! राजनैतिक शुचिता के मामले में हम आम आदमी पार्टी से उदाहरण प्राप्त करते हैं, लेकिन सामाजिक शुचिता, सामाजिक चेतना, समाज को संगठित करने और समाज में आचरण शुद्धि के कार्यक्रम चलाने के बारे में हमारे समाज के अगड़ों को इनके कृतित्व और व्यक्तित्व से सबक लेने में क्यों शर्म आती है! भीनमाल साधु प्रकरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत का विधानसभा के भीतर और बाहर घेराव हो, अलवर दीक्षा प्रकरण हो या फिर जैन साधु-साध्वियों पर कट्टर हिन्दुत्ववादियों के हमले हों, इनके मार्गदर्शन में जैन समुदाय ने अपनी ताकत का अहसास सत्ताधीशों को कराया था।
राजस्थान में पत्थर खदानों, ईंट भट्टों से बंधुआ मजदूरों की मुक्ति और उनके पुनर्वास तथा दिवराला सती प्रकरण जैसे गम्भीर मुद्दों को लेकर संगठित अभियान चलाने वाले जुझारू व्यक्तित्व हीराचंद जैन राष्ट्रीय एवं अन्र्तराष्ट्रीय परिचय के मोहताज नहीं हैं।
श्वेताम्बर जैन समुदाय के हिन्दुत्ववादी अवसरवादी पूंजीपति-धनाढ्य वर्ग नहीं चाहता है कि चौरडिय़ा जी या जैन साहब जैसे अपने कृतित्व और व्यक्तित्व के धनी लोग समाज के आगेवान बने! क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनकी जमी जमाई दुकानदारियां खत्म हो जायेंगी।
लेकिन जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने हेतु केंद्रीय मंत्रिमण्डल की मंजूरी जैन समुदाय की उन्नति के लिये मील का पत्थर साबित होगा। जैन समुदाय के युवकों की सेठों पर आश्रित होने की मजबूरी खत्म होगी। शिक्षा, रोजगार, समाज कल्याण, जैन इतिहास लेखन, जैन सांस्कृतिक अकादमी के गठन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को प्रारम्भ करने के रास्ते खुलेंगे। हमारा उमरावमल चौरडिय़ा, हीराचंद जैन और इन जैसे ही अन्य समाजसेवियों से आग्रह है कि अपने गुमनामी के आवरण को उतारें और सशक्त रूप से समाज को संगठित करने का नये सिरे से प्रयास करें।
हम उन सभी समाज बन्धुओं के शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलाने में अपना प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष योगदान दिया।


