जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिये जाने का मुद्दा फिर से चर्चा में है। केंद्र सरकार के स्तर से इस मुद्दे पर पहल किये जाने के संकेत दिये जा रहे हैं। लेकिन पिछले दस सालों में कांग्रेसनीत डॉ.मनमोहन सिंह सरकार ने इस मुद्दे पर सोचा तक नहीं है। आखीर क्यों? राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और उसके अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टी तो चाहते ही नहीं हैं कि जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो। वे तो साजिशपूर्ण तरीके से यह चाहते हैं कि जैन समुदाय का उनके हिन्दुत्व में विलय हो जाये।
डॉ.आर.वैंकटरमण जब देश के राष्ट्रपति थे तब जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ने उन्हें ज्ञापन देकर जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलाने की मांग की थी। मैं भी इस मुहिम में फ्रंट का सहयोगी था। अन्य कई जैन संगठनों ने भी उस समय जैन यूनाइटेउ लिबरेशन फ्रंट की इस मुहिम में जुट कर आवाज उठाई थी, लेकिन मामला मंत्रिमण्डल और अदालती कार्यवाहियों में उलझ कर रह गया। एच.डी.देवेगौडा के शासनकाल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में नियुक्त किये गये जैन प्रतिनिधी नेमीनाथ के. को भी भाजपानीत अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने, उनके कार्यकाल में वृद्धि नहीं कर उन्हें हटा दिया गया! यहां तक कि उनके स्थान पर किसी अन्य जैन प्रतिनिधी को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। मैं जैन समुदाय के मठाधीशों को याद दिलाना चाहूंगा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के जैन सदस्य के रूप में नेमीनाथ के. जब जयपुर आये थे तब भट्टारक जी की नसिंया स्थित तोतुका सभागार में आयोजित कार्यक्रम में समाज के ठेकेदारों ने भाग नहीं लिया था। वैसे दूसरे दिन दिगम्बर जैन समुदाय के लोगों ने जरूर एक कार्यक्रम आयोजित कर उनका स्वागत किया था।
मैं व्यक्तिश: जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के संघर्ष में पिछले 15 सालों से जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट से लेकर खरतरगच्छ जन चेतना मंच तक के कई संगठनों से जुड़े रह कर संघर्षरत रहा हूं। लेकिन बेशर्मी से जैन समाज के विभिन्न संगठनों-ट्रस्टों पर काबिज पूंजीपतियों, सरमायेदारों और उनके बेशर्म-भ्रष्ट दुमछल्लों ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये आज तक अपनी जुबां नहीं खोली! आज भी राजस्थान की राजधानी जयपुर में श्वेताम्बर समाज के सामाजिक संगठनों पर कब्जा जमाये बैठे सेठियों से इस मुद्दे पर बात की जाये तो वे अपने-अपने बिलों में घुसे नजर आयेंगे।
पिछले दिनों अग्रगामी संदेश को चंद्रप्रभ ध्यान निलयम सम्बोधि धाम जोधपुर से एक ई-मेल प्राप्त हुआ था, जिनमें सवालों के जरिये समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलाने के मामले में जिज्ञासा जाहिर की गई थी। अल्पसंख्यक शब्द अपने आप में स्पष्ट है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि संख्या में कम होना! जैन समुदाय भारत गणतंत्र में आबादी की गणना के अनुसार सबसे कम संख्या वाला समुदाय है। हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध और पारसी ये सभी समुदाय आज जैन समुदाय की आबादी से ज्यादा हैं। जैन समुदाय की राष्ट्रीय स्तर पर आबादी 50 लाख के अन्दर सिमट कर रह गई है। जहां जैन समुदाय को छोड़ कर अन्य समुदायों की आबादी में इजाफा हो रहा है वहीं जैन समुदाय की आबादी निरन्तर घटती ही जा रही है। जैन समुदाय के लिये एक गम्भीर स्थिति यह भी है कि इस समुदाय में कोई प्रमाणिक इतिहासवेत्ता है ही नहीं। महत्वपूर्ण जैन ग्रंथ जर्मनी, चीन, जापान, साउदी अरब, तुर्की, रूस सहित कुछ अन्य देशों में उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें भारत में लाने के कोई प्रयास नहीं किये जा रहे हैं। बल्कि जो ग्रंथ भारत में उपलब्ध हैं, वे भी उचित सार सम्भाल के अभाव में चोरी छिपे देश के बाहर भिजवाये जा रहे हैं। हालांकि दिगम्बर जैन समुदाय में कुछ संस्थाऐं-संगठन जैन साहित्य के संरक्षण में प्रयासरत है, लेकिन ये प्रयास ना काफी है। शर्मनाक स्थिति यह भी है कि जैन संस्कृति के इतिहास के लेखन-पुर्नलेखन एवं शोध प्रबंध की कोई व्यवस्था श्वेताम्बर समुदाय में है ही नहीं।
श्वेताम्बर समाजों के शीर्ष पर बैठे पूंजीपतियों, सरमायेदारों और उनके दुमछल्लों को अब अपने फायदे के बेशर्मी पूर्ण कृत्यों को त्याग कर समाजहित में दायीत्व निर्वहन करने के बारे में सोचना चाहिये अथवा अपने-अपने पदों को त्याग कर समाज में मौजूद योग्य विद्वानों को समाज की बागडोर सौंपनी चाहिये। समाज का और उनका भला इस ही में नीहित है।
डॉ.आर.वैंकटरमण जब देश के राष्ट्रपति थे तब जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ने उन्हें ज्ञापन देकर जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलाने की मांग की थी। मैं भी इस मुहिम में फ्रंट का सहयोगी था। अन्य कई जैन संगठनों ने भी उस समय जैन यूनाइटेउ लिबरेशन फ्रंट की इस मुहिम में जुट कर आवाज उठाई थी, लेकिन मामला मंत्रिमण्डल और अदालती कार्यवाहियों में उलझ कर रह गया। एच.डी.देवेगौडा के शासनकाल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में नियुक्त किये गये जैन प्रतिनिधी नेमीनाथ के. को भी भाजपानीत अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने, उनके कार्यकाल में वृद्धि नहीं कर उन्हें हटा दिया गया! यहां तक कि उनके स्थान पर किसी अन्य जैन प्रतिनिधी को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। मैं जैन समुदाय के मठाधीशों को याद दिलाना चाहूंगा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के जैन सदस्य के रूप में नेमीनाथ के. जब जयपुर आये थे तब भट्टारक जी की नसिंया स्थित तोतुका सभागार में आयोजित कार्यक्रम में समाज के ठेकेदारों ने भाग नहीं लिया था। वैसे दूसरे दिन दिगम्बर जैन समुदाय के लोगों ने जरूर एक कार्यक्रम आयोजित कर उनका स्वागत किया था।
मैं व्यक्तिश: जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के संघर्ष में पिछले 15 सालों से जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट से लेकर खरतरगच्छ जन चेतना मंच तक के कई संगठनों से जुड़े रह कर संघर्षरत रहा हूं। लेकिन बेशर्मी से जैन समाज के विभिन्न संगठनों-ट्रस्टों पर काबिज पूंजीपतियों, सरमायेदारों और उनके बेशर्म-भ्रष्ट दुमछल्लों ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये आज तक अपनी जुबां नहीं खोली! आज भी राजस्थान की राजधानी जयपुर में श्वेताम्बर समाज के सामाजिक संगठनों पर कब्जा जमाये बैठे सेठियों से इस मुद्दे पर बात की जाये तो वे अपने-अपने बिलों में घुसे नजर आयेंगे।
पिछले दिनों अग्रगामी संदेश को चंद्रप्रभ ध्यान निलयम सम्बोधि धाम जोधपुर से एक ई-मेल प्राप्त हुआ था, जिनमें सवालों के जरिये समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलाने के मामले में जिज्ञासा जाहिर की गई थी। अल्पसंख्यक शब्द अपने आप में स्पष्ट है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि संख्या में कम होना! जैन समुदाय भारत गणतंत्र में आबादी की गणना के अनुसार सबसे कम संख्या वाला समुदाय है। हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध और पारसी ये सभी समुदाय आज जैन समुदाय की आबादी से ज्यादा हैं। जैन समुदाय की राष्ट्रीय स्तर पर आबादी 50 लाख के अन्दर सिमट कर रह गई है। जहां जैन समुदाय को छोड़ कर अन्य समुदायों की आबादी में इजाफा हो रहा है वहीं जैन समुदाय की आबादी निरन्तर घटती ही जा रही है। जैन समुदाय के लिये एक गम्भीर स्थिति यह भी है कि इस समुदाय में कोई प्रमाणिक इतिहासवेत्ता है ही नहीं। महत्वपूर्ण जैन ग्रंथ जर्मनी, चीन, जापान, साउदी अरब, तुर्की, रूस सहित कुछ अन्य देशों में उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें भारत में लाने के कोई प्रयास नहीं किये जा रहे हैं। बल्कि जो ग्रंथ भारत में उपलब्ध हैं, वे भी उचित सार सम्भाल के अभाव में चोरी छिपे देश के बाहर भिजवाये जा रहे हैं। हालांकि दिगम्बर जैन समुदाय में कुछ संस्थाऐं-संगठन जैन साहित्य के संरक्षण में प्रयासरत है, लेकिन ये प्रयास ना काफी है। शर्मनाक स्थिति यह भी है कि जैन संस्कृति के इतिहास के लेखन-पुर्नलेखन एवं शोध प्रबंध की कोई व्यवस्था श्वेताम्बर समुदाय में है ही नहीं।
श्वेताम्बर समाजों के शीर्ष पर बैठे पूंजीपतियों, सरमायेदारों और उनके दुमछल्लों को अब अपने फायदे के बेशर्मी पूर्ण कृत्यों को त्याग कर समाजहित में दायीत्व निर्वहन करने के बारे में सोचना चाहिये अथवा अपने-अपने पदों को त्याग कर समाज में मौजूद योग्य विद्वानों को समाज की बागडोर सौंपनी चाहिये। समाज का और उनका भला इस ही में नीहित है।


