जयपुर (अग्रगामी) राजस्थान में विधानसभा चुनावों में 183 सीटें और दो तिहाई से ज्यादा बहुमत बटोरने के बाद अब भाजपानीत वसुन्धरा राजे के नेतृत्व वाली सरकार ने जनता के दु:खदर्दों से किनारा करना शुरू कर दिया है! 11 सूत्रीय 60 दिवसीय कार्ययोजना बना कर लागू करने में ही वसुन्धरा राजे सरकार के मंत्रियों और नौकरशाहों की धूजनी छूट रही है।
राज्य मंत्रीमण्डल की बैठक में मंहगाई, बेराजगारी, जमाखोरी, कालाबाजारी, बिजली-पानी की दरें घटाने, भू-माफियाओं पर अंकुश लगाने जैसे सार्वजनिक हित के एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई, कार्यवाही करने की बात तो दूर की कौडी है। अलबत्ता राज्य के शिक्षामंत्री कालीचरण सर्राफ का एक बेतुका बयान जरूर आया है कि सभी व्यापारी कालाबाजारिये नहीं होते हैं। अवाम को मालूम है कि सभी व्यापारी जमाखोर-कालाबाजारिये और मुनाफाखोर नहीं होते हैं, लेकिन व्यापारियों की जमात में घुसे जमाखोरों-कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर सरकार क्यों अपना प्रशासनिक हथौडा चलाने से डरती है? उत्तर साफ है कि इन जमाखोरों-कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों से ही तो राजनैतिक पार्टियों को मोटा चंदा मिलता है। ऐसी हालत में राजनैतिक पार्टियां खास कर सत्तारूढ दल जमाखोरों-कालाबाजारियों रूपी दुधारू गाय-भैंसों पर कैसे प्रशासनिक हथौडा चलाये? अगर कार्यवाही की गई तो चुनावी चंदा बंद और नेताओं की कुर्सी रूपी भैंस पहुंच जायेगी पानी में!
जयपुर नगर निगम क्षेत्र में भू-माफियाओं और बिल्डर माफियाओं का आतंक है। जयपुर नगर निगम क्षेत्र में खास कर चार दिवारी क्षेत्र में भारी तादाद में बिना इजाजत गैरकानूनी तरीके से यह बिल्डर माफिया अवैध कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों के निर्माण में संलिप्त हैं और इन्हें क्षेत्र के पार्षदों और अफसरों का संरक्षण प्राप्त है। जब एक बड़े बिल्डर माफिया के खिलाफ सप्रमाण शिकायत जयपुर नगर निगम में की गई तो निगम के दफ्तर से शिकायतकर्ता का पता ठिकाना लेकर उक्त बिल्डर माफिया गया शिकायतकर्ता के घर पर और रोब गांठने लगा कि उसका सहयोगी एक भाजपा विधायक, जोकि अब वसुन्धरा राजे के मंत्रीमण्डल में केबीनेट मंत्री है, के साथ रोज सुबह जॉगिंग करते हैं और हमारे अवैध कॉमर्शियल काम्प्लेक्स के खिलाफ कार्यवाही करने की सरकार में बैठे किसी मंत्री या अधिकारी की हिम्मत नहीं है!
इस बिल्डर माफिया का कथन सही और सटीक रहा, क्योंकि कार्यवाही के स्पष्ट आदेश रेकार्ड पर होने के बावजूद विधायक जी और अब वसुन्धरा राजे सरकार में मंत्री जी के साथ जॉगिंग करने वाले इस भू-माफिया/बिल्डर माफिया के खिलाफ कानून और आदेशों की पालना में कार्यवाही करने की हैसियत या यों कहें कि औकात किसी अफसर में नहीं है!
आपातकाल में जिन लोगों को मीसा में जेलों में डाला गया था, उनकी पुन: पेंशन चालू करने का फैसला मंत्रीमण्डल की बैठक में लिया गया है। यह समझ से परे है कि आपातकाल के 32 साल के अधिक समय गुजर जाने के बाद ऐसे कितने मीसा बंदी हैं, जिन्हें दाल-रोटी के लाले पड़ रहे हैं और जिन्हें पेंशन की जरूरत है! हमें जहां तक जानकारी है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और इसके अग्रिम संगठनों और संघ से जुड़े अन्य संगठनों और उनके पदाधिकारियों ने पहिले भी आर्थिक पैकेज लेने से इन्कार कर दिया था। बकौल स्वंयसेवक संघ के सहविभाग संघ चालक गोविन्द प्रसाद अरोड़ा के, मीसा में बंद हो चुके स्वंयसेवकों को पेंशन लेने से गुरेज करना चाहिये। स्वंयसेवकों ने आपातकाल के समय जेल जाकर देश के अवाम के प्रति अपना दायीत्व निभाया था। उनका कहना है कि आरएसएस के स्वंयसेवक अवाम के प्रति कर्तव्य निभाते हैं, पैसा लेकर व्यापार नहीं करते हैं!
राजस्थान के अवाम की जबर्दस्त मांग है कि बिजली के दामों में तत्काल कमी होनी चाहिये। चाहे टैरिफ में बदलाव हो या फिर सब्सिडी के जरिये राहत मिले! लेकिन भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार के ऊर्जा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर का कहना है कि बिजली के दाम नहीं घटाये जायेंगे। उधर मंत्रीमण्डल की दूसरी बैठक में भी बिजली के दाम घटाने के मुद्दे पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार ने आर.जी.गुप्ता को तीनों बिजली वितरण कम्पनियों का चेयरमैन बना दिया है। ये वही आर.जी.गुप्ता हैं, जिन पर, उनके पुराने कार्यकाल में गम्भीर अनियमितताओं के आरोप लगे थे।
पानी की दरों को घटाने की अगर बात की जाये तो इस पर भी भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार ने न तो प्रशासनिक स्तर पर कोई फैसला लिया और न ही मंत्रीमण्डलन की इस दूसरी बैठक के ऐजेंडे में इस मुद्दे को रखा!
मंहगाई पर भी भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार में प्रशासनिक स्तर पर न तो किसी तरह की कोई कार्यवाही करने का आदेश जारी हुआ है और न ही मंत्रीमण्डल में किसी भी तरह की कोई योजना पर फैसला हुआ है। यही हाल जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों के खिलाफ कार्यवाही किये जाने के बारे में है! क्योंकि इस बारे में कोई सोच ही भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार का अभी तक उजागर नहीं हुआ है!
सूचना का अधिकार कानून से सम्बन्धित मुद्दों पर भी वसुन्धरा राजे सरकार मौन है। राज्य सूचना आयोग में हजारों अपीलें लम्बित हैं। 90 दिन में फैसले दिये जाने की तो बात ही छोड़ दें, 90 दिन से ज्यादा लम्बी तो सिर्फ तारीखें ही दी जा रही है। तीन सूचना आयुक्तों की तत्काल नियुक्ति किया जाना आवश्यक है, लेकिन नियुक्तियों के बारे में कोई निर्णय ही नहीं लिया जा रह है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरूस्त करने, शिक्षा व चिकित्सा विभाग में जनहित को देखते हुए बदलाव करने के बारे में भी सरकार के जहन में कोई सोच नहीं है।
सरकार का, जनवरी-2014 का पहला पखवाडा तो सिफ मुख्यमंत्री की 60 दिन की योजना बनाने व लागू करने की जद्दोजहद में निकल जायेगा, फिर दूसरे पखवाडे में विधानसभा के विधायी कामकाज को निपटाने में सरकार अपनी ताकत खपायेगी। फरवरी में वह भाजपा को लोकसभा चुनावों में 25 सीटं दिलवाने की योजना को क्रियान्वित करवाने में गायेगी। इसके बाद चुनाव आचार संहिता लागू होने की स्थिति बनती नजर आ रही है। नतीजन 01 मार्च, 2014 से चुनावी आचार संहिता लागू होने तक के समय में आखीर सरकार जनहित के क्या-क्या कार्य कर लेगी!
अब भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार और उनके मंत्रीमण्डल के सहयोगियों को साफ-साफ बताना होगा कि जनहित के मुद्दों पर वो क्या सार्थक काम करने की सोच रखते हैं और आगामी लोकसभा चुनावों की आचार संहिता लागू होने से पूर्व वे क्या-क्या काम कर पायेंगे!
राज्य मंत्रीमण्डल की बैठक में मंहगाई, बेराजगारी, जमाखोरी, कालाबाजारी, बिजली-पानी की दरें घटाने, भू-माफियाओं पर अंकुश लगाने जैसे सार्वजनिक हित के एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई, कार्यवाही करने की बात तो दूर की कौडी है। अलबत्ता राज्य के शिक्षामंत्री कालीचरण सर्राफ का एक बेतुका बयान जरूर आया है कि सभी व्यापारी कालाबाजारिये नहीं होते हैं। अवाम को मालूम है कि सभी व्यापारी जमाखोर-कालाबाजारिये और मुनाफाखोर नहीं होते हैं, लेकिन व्यापारियों की जमात में घुसे जमाखोरों-कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर सरकार क्यों अपना प्रशासनिक हथौडा चलाने से डरती है? उत्तर साफ है कि इन जमाखोरों-कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों से ही तो राजनैतिक पार्टियों को मोटा चंदा मिलता है। ऐसी हालत में राजनैतिक पार्टियां खास कर सत्तारूढ दल जमाखोरों-कालाबाजारियों रूपी दुधारू गाय-भैंसों पर कैसे प्रशासनिक हथौडा चलाये? अगर कार्यवाही की गई तो चुनावी चंदा बंद और नेताओं की कुर्सी रूपी भैंस पहुंच जायेगी पानी में!
जयपुर नगर निगम क्षेत्र में भू-माफियाओं और बिल्डर माफियाओं का आतंक है। जयपुर नगर निगम क्षेत्र में खास कर चार दिवारी क्षेत्र में भारी तादाद में बिना इजाजत गैरकानूनी तरीके से यह बिल्डर माफिया अवैध कॉमर्शियल काम्प्लेक्सों के निर्माण में संलिप्त हैं और इन्हें क्षेत्र के पार्षदों और अफसरों का संरक्षण प्राप्त है। जब एक बड़े बिल्डर माफिया के खिलाफ सप्रमाण शिकायत जयपुर नगर निगम में की गई तो निगम के दफ्तर से शिकायतकर्ता का पता ठिकाना लेकर उक्त बिल्डर माफिया गया शिकायतकर्ता के घर पर और रोब गांठने लगा कि उसका सहयोगी एक भाजपा विधायक, जोकि अब वसुन्धरा राजे के मंत्रीमण्डल में केबीनेट मंत्री है, के साथ रोज सुबह जॉगिंग करते हैं और हमारे अवैध कॉमर्शियल काम्प्लेक्स के खिलाफ कार्यवाही करने की सरकार में बैठे किसी मंत्री या अधिकारी की हिम्मत नहीं है!
इस बिल्डर माफिया का कथन सही और सटीक रहा, क्योंकि कार्यवाही के स्पष्ट आदेश रेकार्ड पर होने के बावजूद विधायक जी और अब वसुन्धरा राजे सरकार में मंत्री जी के साथ जॉगिंग करने वाले इस भू-माफिया/बिल्डर माफिया के खिलाफ कानून और आदेशों की पालना में कार्यवाही करने की हैसियत या यों कहें कि औकात किसी अफसर में नहीं है!
आपातकाल में जिन लोगों को मीसा में जेलों में डाला गया था, उनकी पुन: पेंशन चालू करने का फैसला मंत्रीमण्डल की बैठक में लिया गया है। यह समझ से परे है कि आपातकाल के 32 साल के अधिक समय गुजर जाने के बाद ऐसे कितने मीसा बंदी हैं, जिन्हें दाल-रोटी के लाले पड़ रहे हैं और जिन्हें पेंशन की जरूरत है! हमें जहां तक जानकारी है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और इसके अग्रिम संगठनों और संघ से जुड़े अन्य संगठनों और उनके पदाधिकारियों ने पहिले भी आर्थिक पैकेज लेने से इन्कार कर दिया था। बकौल स्वंयसेवक संघ के सहविभाग संघ चालक गोविन्द प्रसाद अरोड़ा के, मीसा में बंद हो चुके स्वंयसेवकों को पेंशन लेने से गुरेज करना चाहिये। स्वंयसेवकों ने आपातकाल के समय जेल जाकर देश के अवाम के प्रति अपना दायीत्व निभाया था। उनका कहना है कि आरएसएस के स्वंयसेवक अवाम के प्रति कर्तव्य निभाते हैं, पैसा लेकर व्यापार नहीं करते हैं!
राजस्थान के अवाम की जबर्दस्त मांग है कि बिजली के दामों में तत्काल कमी होनी चाहिये। चाहे टैरिफ में बदलाव हो या फिर सब्सिडी के जरिये राहत मिले! लेकिन भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार के ऊर्जा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर का कहना है कि बिजली के दाम नहीं घटाये जायेंगे। उधर मंत्रीमण्डल की दूसरी बैठक में भी बिजली के दाम घटाने के मुद्दे पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार ने आर.जी.गुप्ता को तीनों बिजली वितरण कम्पनियों का चेयरमैन बना दिया है। ये वही आर.जी.गुप्ता हैं, जिन पर, उनके पुराने कार्यकाल में गम्भीर अनियमितताओं के आरोप लगे थे।
पानी की दरों को घटाने की अगर बात की जाये तो इस पर भी भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार ने न तो प्रशासनिक स्तर पर कोई फैसला लिया और न ही मंत्रीमण्डलन की इस दूसरी बैठक के ऐजेंडे में इस मुद्दे को रखा!
मंहगाई पर भी भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार में प्रशासनिक स्तर पर न तो किसी तरह की कोई कार्यवाही करने का आदेश जारी हुआ है और न ही मंत्रीमण्डल में किसी भी तरह की कोई योजना पर फैसला हुआ है। यही हाल जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों के खिलाफ कार्यवाही किये जाने के बारे में है! क्योंकि इस बारे में कोई सोच ही भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार का अभी तक उजागर नहीं हुआ है!
सूचना का अधिकार कानून से सम्बन्धित मुद्दों पर भी वसुन्धरा राजे सरकार मौन है। राज्य सूचना आयोग में हजारों अपीलें लम्बित हैं। 90 दिन में फैसले दिये जाने की तो बात ही छोड़ दें, 90 दिन से ज्यादा लम्बी तो सिर्फ तारीखें ही दी जा रही है। तीन सूचना आयुक्तों की तत्काल नियुक्ति किया जाना आवश्यक है, लेकिन नियुक्तियों के बारे में कोई निर्णय ही नहीं लिया जा रह है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरूस्त करने, शिक्षा व चिकित्सा विभाग में जनहित को देखते हुए बदलाव करने के बारे में भी सरकार के जहन में कोई सोच नहीं है।
सरकार का, जनवरी-2014 का पहला पखवाडा तो सिफ मुख्यमंत्री की 60 दिन की योजना बनाने व लागू करने की जद्दोजहद में निकल जायेगा, फिर दूसरे पखवाडे में विधानसभा के विधायी कामकाज को निपटाने में सरकार अपनी ताकत खपायेगी। फरवरी में वह भाजपा को लोकसभा चुनावों में 25 सीटं दिलवाने की योजना को क्रियान्वित करवाने में गायेगी। इसके बाद चुनाव आचार संहिता लागू होने की स्थिति बनती नजर आ रही है। नतीजन 01 मार्च, 2014 से चुनावी आचार संहिता लागू होने तक के समय में आखीर सरकार जनहित के क्या-क्या कार्य कर लेगी!
अब भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार और उनके मंत्रीमण्डल के सहयोगियों को साफ-साफ बताना होगा कि जनहित के मुद्दों पर वो क्या सार्थक काम करने की सोच रखते हैं और आगामी लोकसभा चुनावों की आचार संहिता लागू होने से पूर्व वे क्या-क्या काम कर पायेंगे!


