हम डायन गरीबी और चुडैल अमीरी के शिकंजे में जकड़े और उनके दंश से पीडि़त जैन श्वेताम्बर परिवार से जुड़ी हकीकत को बयां करने का प्रयास कर रहे है। इस परिवार की हकीकत जैन श्वेताम्बर समाज के अन्य सैंकड़ों परिवारों की पीड़ा भी हो सकती है और सिर्फ श्वेताम्बर जैन समाज के परिवारों की ही पीड़ा क्यों, समग्र जैन समुदाय के सैंकड़ों से हजारों परिवारों की हो सकती हैं, जो डायन गरीबी के शिकंजे में जकड़े, बेबस चुडैल अमीरी के अत्याचारों से पीडि़त होंगे!
हम डायन गरीबी और चुडैल अमीरी के गतांक से आगे के क्रम को जारी रखने से पहिले प्रबुद्ध पाठकों के सामने एक अहम सवाल रखना चाहते हैं! यह सवाल सिर्फ चकल्लस करने की नौटंकी नहीं है, बल्कि जैन समुदाय के सदस्यों की सामाजिक नैतिकता और आचरण को झकझोरने वाला एक गम्भीर दायीत्वपूर्ण कर्तव्य है।
सवाल सीधा और सपाट है कि क्या श्वेताम्बर समाज के एक परिवार का बेटा अपनी दादागिरी और चुडैल अमीरी के बूते पर परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकारों और उनके जायज हकों पर तिकड़म लगा कर अपना कब्जा जमा कर उस परिवार को दोखज की भट्टी में झौंकने का कृतघ्नतापूर्ण कृत्य कर सकता है और अब सवाल यहीं से शुरू होता है कि एक परिवार के वयस्क सदस्य, पिता और भाई मिल कर एक स्थावर सम्पत्ति (मकान) को खरीदते हैं! इस सामुहिक दायीत्वों के तहत पिता के नाम से खरीदी हुई इस सम्पत्ति (मकान) को परिवार का छोटा भाई अपने पिता पर चुडैल अमीरी और दादागिरी के जरिये दबाव डाल कर अपने नाम से बेचान करवा लेता है। याने कि परिवार की सामुहिक सम्पत्ति को यह परिवार के मुखिया से खरीदने की घृणित करतूत करता है वहीं अपने पिता के जिंदा रहते हुए उन पर और अन्य परिजनों पर बाकी बची हुई सम्पत्ति के बंटवारे का अदालत में मुकदमा ठोक देता है। कानून अपनी जगह और कानून अपना काम करेगा, हमें उस पर टिप्पणी नहीं करनी है। लेकिन इंसानियत और नैतिकता का क्या तकाजा है? क्या संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा कर्ता (मुखिया) के नाम से खरीदी हुई सम्पत्ति को मुखिया से खरीद सकता है? साथ ही क्या बची हुई स्थावर सम्पत्ति में अपना हिस्सा लेने के लिये परिवार के उसी कर्ता (मुखिया) पर तकासमें (सम्पत्ति के बंटवारे) का मुकदमा ठोक सकता है? जिससे उसने परिवार की आधी सम्पत्ति खरीदने की घृणित करतूत की। यह है चुडैल अमीरी के शिकंजे में जकड़े एक व्यक्ति की अनैतिकता का हकीकत भरा उदाहरण।
अब श्वेताम्बर समाज को ही तैय करना है कि क्या इस तरह की हरकतें उनके समाज में वैधानिक तरीके से मान्य है, यदि नहीं तो क्यों वे समाजहित में कुछ मानवीय एवं नैतिकता भरे कदम उठाने से हिचक रहे हैं? हम उदाहरण दें, उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के ही एक सामाजिक संस्था का! दंगों से पीडि़त लोगों को सरकारी इमदाद का इंतजार किये बिना इस सामाजिक संगठन ने जमीन खरीदी और उस पर आवासीय निर्माण करवाया तथा अब तक 85 से ज्यादा परिवारों को मकान बना कर उन्हें पुनर्वासित कर दिया। यही नहीं उनके आवासों के मालिकाना हक के कागजात भी उन्हें सौंप दिये। इसे कहते हैं समाज सेवा! क्या थोडी सी भी नैतिकता हमारे समाज के अगड़ों में है तो समाज के अगड़े उपरोक्त सामाजिक संस्था से सबक लें और अपने समाज में अमीरी चुडैल के बूते पर रहे अत्याचारों को रोकने के लिये अत्याचारियों पर अंकुश लगायें और गरीबी डायन के शिकंजे में फंसे अपने समाज के बंधुओं को अमीरी चुडैल के अत्याचारों से मुक्ति दिलवायें। क्रमश:
हम डायन गरीबी और चुडैल अमीरी के गतांक से आगे के क्रम को जारी रखने से पहिले प्रबुद्ध पाठकों के सामने एक अहम सवाल रखना चाहते हैं! यह सवाल सिर्फ चकल्लस करने की नौटंकी नहीं है, बल्कि जैन समुदाय के सदस्यों की सामाजिक नैतिकता और आचरण को झकझोरने वाला एक गम्भीर दायीत्वपूर्ण कर्तव्य है।
सवाल सीधा और सपाट है कि क्या श्वेताम्बर समाज के एक परिवार का बेटा अपनी दादागिरी और चुडैल अमीरी के बूते पर परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकारों और उनके जायज हकों पर तिकड़म लगा कर अपना कब्जा जमा कर उस परिवार को दोखज की भट्टी में झौंकने का कृतघ्नतापूर्ण कृत्य कर सकता है और अब सवाल यहीं से शुरू होता है कि एक परिवार के वयस्क सदस्य, पिता और भाई मिल कर एक स्थावर सम्पत्ति (मकान) को खरीदते हैं! इस सामुहिक दायीत्वों के तहत पिता के नाम से खरीदी हुई इस सम्पत्ति (मकान) को परिवार का छोटा भाई अपने पिता पर चुडैल अमीरी और दादागिरी के जरिये दबाव डाल कर अपने नाम से बेचान करवा लेता है। याने कि परिवार की सामुहिक सम्पत्ति को यह परिवार के मुखिया से खरीदने की घृणित करतूत करता है वहीं अपने पिता के जिंदा रहते हुए उन पर और अन्य परिजनों पर बाकी बची हुई सम्पत्ति के बंटवारे का अदालत में मुकदमा ठोक देता है। कानून अपनी जगह और कानून अपना काम करेगा, हमें उस पर टिप्पणी नहीं करनी है। लेकिन इंसानियत और नैतिकता का क्या तकाजा है? क्या संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा कर्ता (मुखिया) के नाम से खरीदी हुई सम्पत्ति को मुखिया से खरीद सकता है? साथ ही क्या बची हुई स्थावर सम्पत्ति में अपना हिस्सा लेने के लिये परिवार के उसी कर्ता (मुखिया) पर तकासमें (सम्पत्ति के बंटवारे) का मुकदमा ठोक सकता है? जिससे उसने परिवार की आधी सम्पत्ति खरीदने की घृणित करतूत की। यह है चुडैल अमीरी के शिकंजे में जकड़े एक व्यक्ति की अनैतिकता का हकीकत भरा उदाहरण।
अब श्वेताम्बर समाज को ही तैय करना है कि क्या इस तरह की हरकतें उनके समाज में वैधानिक तरीके से मान्य है, यदि नहीं तो क्यों वे समाजहित में कुछ मानवीय एवं नैतिकता भरे कदम उठाने से हिचक रहे हैं? हम उदाहरण दें, उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के ही एक सामाजिक संस्था का! दंगों से पीडि़त लोगों को सरकारी इमदाद का इंतजार किये बिना इस सामाजिक संगठन ने जमीन खरीदी और उस पर आवासीय निर्माण करवाया तथा अब तक 85 से ज्यादा परिवारों को मकान बना कर उन्हें पुनर्वासित कर दिया। यही नहीं उनके आवासों के मालिकाना हक के कागजात भी उन्हें सौंप दिये। इसे कहते हैं समाज सेवा! क्या थोडी सी भी नैतिकता हमारे समाज के अगड़ों में है तो समाज के अगड़े उपरोक्त सामाजिक संस्था से सबक लें और अपने समाज में अमीरी चुडैल के बूते पर रहे अत्याचारों को रोकने के लिये अत्याचारियों पर अंकुश लगायें और गरीबी डायन के शिकंजे में फंसे अपने समाज के बंधुओं को अमीरी चुडैल के अत्याचारों से मुक्ति दिलवायें। क्रमश:


