दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) राजस्थान सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही चुनावी महासमर का प्रारम्भ हो गया है। बड़ी हो या छोटी, सभी राजनैतिक पार्टियां, अपने चुनावी उम्मीदवारों की तलाश में जुटी है। कहीं पार्टियों को उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं, तो कहीं उम्मीदवार को उसके मनमाफिक राजनैतिक पार्टी का टिकट नहीं मिल रहा है।
उम्मीदवार एक तरफ अपनी पसंद की राजनैतिक पार्टी का टिकट नहीं मिलने से परेशान होकर दूसरी ऐसी राजनैतिक पार्टी की तलाश में जुटने हेतु मजबूर हो रहे हैं, जिसका सिम्बल लोगों को आकर्षित कर सके।
कई ऐसी राजनैतिक पार्टियां हैं जिनके नेताओं ने पार्टी को चकाचौंध के जरिये मैदान में उतारने की तैयारी की, लेकिन चुनाव आयोग से चुनावी सिम्बल लेने से सम्बन्धित खानापूर्ति नहीं की। नतीजन अब उन्हें अपने उम्मीदवारों को निर्दलिय के रूप में मैदान में उतारना होगा। उनके सभी उम्मीदवारों को एक ही सिम्बल मिलने के स्थान पर अलग-अलग सिम्बल मिलने की स्थिति पैदा हो गई है।
कांग्रेस और भाजपा में भी पार्टी सिम्बल को लेकर गहरी खैंचतान चल रही है। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नेे पार्टी की एकता बनाये रखने के लिये साफ-साफ कह दिया है कि राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा? यह मुद्दा चुनाव के बाद ही तैय होगा। फिलहाल पार्टी के पास एकजुट होकर चुनाव जीतने का ही लक्ष्य है।
हर चुनावों के समय छोटे मोटे छुटभैय्या नेता भी अपनी कालर चमका कर सम्बन्धित पार्टी का टिकट मांगने के लिये भीड़ जुटा कर अपने आका नेताजी के पास पहुंच जाता है, टिकट मांगने के लिये! इस बार भी छुटभैय्या नेता कुर्ते में कलफ चमका कर भीड़ जुटा कर पहुंच रहे हैं अपने आका नेताओं के पास एमएलए बनने का टिकट मांगने के लिये। हालांकि इनमें से अधिकांश की म्युनिसिपल वार्ड पार्षद या गांव की ग्राम पंचायत का वार्ड पंच बनने की हैसियत भी नहीं होती है। लेकिन यही तो वक्त है अपना रूतबा दिखा कर आने वाले वक्त में अपने काम निकलवाने की गारंटी लेने का!
उधर चुनाव आयोग है कि मानता ही नहीं है। लगाये जा रहा है बंदिशों पर बंदिशें! अब छुटभैय्या नेताओं कि समझ में नहीं आ रहा है कि अगर उन्हें चुनाव के लिये पार्टी का टिकट (सिम्बल) मिला, तो चुनाव आयोग जैसी मुसीबत सामने है। चुनाव लडऩा है तो बैंक में खाता खोलो, चुनाव का खर्च बैंक में जमा राशि से करो! अब नेताजी की मुसीबत है कि अपने पुछल्लों को अगर चाय पिलाई तो उसका भुगतान उन्हें चैक से करना होगा। यह तैय है कि चाय वाला चैक लेगा नहीं! इसकी काट का कोई रास्ता नेताजी को समझ में नहीं आ रहा है। उधर चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनावी खर्चे का हिसाब उम्मीदवार को रोजाना देना होगा। चुनाव के लिये उम्मीदवारी का फार्म भी पूरी तरह भरा हुआ पेश होना चाहिये वर्ना होगा रद्द!
पार्टी उम्मीदवार बनने की जुगत लगा रहे नेताजी के हालात ये हैं कि वे धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रमों में शिरकत तो कर सकते हैं लेकिन जबान तालू से चिपका कर! शादी-ब्याह में भी अगर वोट मांगने की जुगत बैठाई तो जीमण का पूरा खर्चा खाते में नामे होने का डर! अब क्या करे नेताजी, छुटभैय्या नेता और पार्टी टिकट के दावेदार!
अब समस्या शब्द ने राजनैतिक पार्टियों के छुटभैय्या राजनेताओं को चारों ओर से घेरना शुरू कर दिया है। पहिले, उम्मीदवारों का टोटा, फिर इंकमटैक्स के अफसरों का डण्डा, पार्टी आकाओं के अडंगों पर अडंगे!
खैर बेचारे जुटे हैं चुनावी दंगल में! इस दंगल में 01 दिसम्बर, 2013 को होगा मंगल। जिस दिन राजस्थान में वोट पड़ेगें, पार्टी उम्मीदवारों का भविष्य कैद होगा वोटिंग मशीनों में। लेकिन यहां भी एक फच्चर है नोटा (हृह्रञ्ज्र) का! वोटिंग मशीन में अन्त में एक बटन होगा, जिस पर लिखा होगा नोटा (नन ऑफ दा अबॉव) याने उपरोक्त में से कोई भी नहीं। अगर थोक में लोगों ने इसे दबा दिया तो क्या होगा? जैय रामजी की!
उम्मीदवार एक तरफ अपनी पसंद की राजनैतिक पार्टी का टिकट नहीं मिलने से परेशान होकर दूसरी ऐसी राजनैतिक पार्टी की तलाश में जुटने हेतु मजबूर हो रहे हैं, जिसका सिम्बल लोगों को आकर्षित कर सके।
कई ऐसी राजनैतिक पार्टियां हैं जिनके नेताओं ने पार्टी को चकाचौंध के जरिये मैदान में उतारने की तैयारी की, लेकिन चुनाव आयोग से चुनावी सिम्बल लेने से सम्बन्धित खानापूर्ति नहीं की। नतीजन अब उन्हें अपने उम्मीदवारों को निर्दलिय के रूप में मैदान में उतारना होगा। उनके सभी उम्मीदवारों को एक ही सिम्बल मिलने के स्थान पर अलग-अलग सिम्बल मिलने की स्थिति पैदा हो गई है।
कांग्रेस और भाजपा में भी पार्टी सिम्बल को लेकर गहरी खैंचतान चल रही है। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नेे पार्टी की एकता बनाये रखने के लिये साफ-साफ कह दिया है कि राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा? यह मुद्दा चुनाव के बाद ही तैय होगा। फिलहाल पार्टी के पास एकजुट होकर चुनाव जीतने का ही लक्ष्य है।
हर चुनावों के समय छोटे मोटे छुटभैय्या नेता भी अपनी कालर चमका कर सम्बन्धित पार्टी का टिकट मांगने के लिये भीड़ जुटा कर अपने आका नेताजी के पास पहुंच जाता है, टिकट मांगने के लिये! इस बार भी छुटभैय्या नेता कुर्ते में कलफ चमका कर भीड़ जुटा कर पहुंच रहे हैं अपने आका नेताओं के पास एमएलए बनने का टिकट मांगने के लिये। हालांकि इनमें से अधिकांश की म्युनिसिपल वार्ड पार्षद या गांव की ग्राम पंचायत का वार्ड पंच बनने की हैसियत भी नहीं होती है। लेकिन यही तो वक्त है अपना रूतबा दिखा कर आने वाले वक्त में अपने काम निकलवाने की गारंटी लेने का!
उधर चुनाव आयोग है कि मानता ही नहीं है। लगाये जा रहा है बंदिशों पर बंदिशें! अब छुटभैय्या नेताओं कि समझ में नहीं आ रहा है कि अगर उन्हें चुनाव के लिये पार्टी का टिकट (सिम्बल) मिला, तो चुनाव आयोग जैसी मुसीबत सामने है। चुनाव लडऩा है तो बैंक में खाता खोलो, चुनाव का खर्च बैंक में जमा राशि से करो! अब नेताजी की मुसीबत है कि अपने पुछल्लों को अगर चाय पिलाई तो उसका भुगतान उन्हें चैक से करना होगा। यह तैय है कि चाय वाला चैक लेगा नहीं! इसकी काट का कोई रास्ता नेताजी को समझ में नहीं आ रहा है। उधर चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनावी खर्चे का हिसाब उम्मीदवार को रोजाना देना होगा। चुनाव के लिये उम्मीदवारी का फार्म भी पूरी तरह भरा हुआ पेश होना चाहिये वर्ना होगा रद्द!
पार्टी उम्मीदवार बनने की जुगत लगा रहे नेताजी के हालात ये हैं कि वे धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रमों में शिरकत तो कर सकते हैं लेकिन जबान तालू से चिपका कर! शादी-ब्याह में भी अगर वोट मांगने की जुगत बैठाई तो जीमण का पूरा खर्चा खाते में नामे होने का डर! अब क्या करे नेताजी, छुटभैय्या नेता और पार्टी टिकट के दावेदार!
अब समस्या शब्द ने राजनैतिक पार्टियों के छुटभैय्या राजनेताओं को चारों ओर से घेरना शुरू कर दिया है। पहिले, उम्मीदवारों का टोटा, फिर इंकमटैक्स के अफसरों का डण्डा, पार्टी आकाओं के अडंगों पर अडंगे!
खैर बेचारे जुटे हैं चुनावी दंगल में! इस दंगल में 01 दिसम्बर, 2013 को होगा मंगल। जिस दिन राजस्थान में वोट पड़ेगें, पार्टी उम्मीदवारों का भविष्य कैद होगा वोटिंग मशीनों में। लेकिन यहां भी एक फच्चर है नोटा (हृह्रञ्ज्र) का! वोटिंग मशीन में अन्त में एक बटन होगा, जिस पर लिखा होगा नोटा (नन ऑफ दा अबॉव) याने उपरोक्त में से कोई भी नहीं। अगर थोक में लोगों ने इसे दबा दिया तो क्या होगा? जैय रामजी की!


