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इस शताब्दी का सबसे बड़ा तमाशा या खजाना अब तीन सरकारों के सपनों के चलते खुदाई शुरू!

डौंडिया खेड़ा/उन्नाव/दिल्ली (अग्रगामी) तीन सरकारों के सपनों के चलते डौंडिया खेड़ा (उन्नाव) में राव राजा रामबक्क्ष सिंह के किले के नाम से मशहुर गंगातट पर स्थित किले के प्रांगण में रामेश्वर मंदिर के पास स्थित कुंए के नजदीक जमीन की खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) और जिलोलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया (जीएसआई) ने शुरू कर दी है!
शोभन सरकार (स्वामी विरक्तानन्द) के दावे के मद्देनजर केंद्र सरकार के निर्देशानुसार उत्तरप्रदेश सरकार के सहयोग से एएसआई और जीएसआई ने पिछली 18 अक्टूबर से खुदाई का काम चालू कर दिया है! सूत्र बताते हैं कि प्रारम्भिक सर्वे में खुदाई स्थल पर जमीन से 25 फुट नीचे अलोह धातु होने के संकेत मिले हैं। हालांकि एएसआई के महानिदेशक ने कोई बड़ा खजाना होने के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। अब शोभन सरकार भी अपने दावे से मुकरने लगे हैं।
इतिहासकारों का स्पष्ट मानना है कि राव राजा रामबक्क्ष सिंह या उनके पूर्ववर्ती राजाओं के पास कभी भी इतना सोना या सम्पत्ति नहीं रही है। वहीं अवध और रामपुर के राजघरानों के पास भी इतना खजाना नहीं था।
ऐसी स्थिति में अगर उन्नाव के पास डौंडिया खेड़ा में राव राजा रामबक्क्ष सिंह के किले में रामेश्वर मंदिर और कुंए के बीच जमीन के नीचे से खजाना निकलता है तो इस खजाने के सूत्र आज से 2578 वर्ष पूर्व की जिन संस्कृति (जैन संस्कृति) के इतिहास से जुड़े होने के संकेत देते हैं।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से लगभग 60 किलोमीटर दूर डौंडिया खेड़ा गांव के स्वर्गीय राव राजा रामबक्क्ष सिंह के जिस किले में मंदिर के पास कुंए के नजदीक जमीन के नीचे एक हजार टन सोना होने की उम्मीद की जा रही है अगर वहां इतनी तादाद में सोना पाया जाता है तो जैन समुदाय के सांस्कृतिक इतिहास की सच्चाइयां परत दर परत खुलती ही चली जायेंगी!
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से 60 किलोमीटर दूर डौंडिया खेड़ा गांव के जिस किले और मंदिर के बीच कुंए के पास की जमीन के नीचे सोना होने के संकेत मिलने के चलते खुदाई के लिये भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) ने चिन्हित किया है उसके पुरातत्व महत्व के बारे में पड़ताल करने की बात किसी के जहन में नहीं आई थी। दरअसल अगर डोडिया खेड़ा गांव में एक हजार टन सोना मिलने की बात सच निकलती है तो यह उस ही सोने के खजाने का हिस्सा है, जिसे जैन संस्कृति के महान् योद्धा पाश्र्व वीरभट्टारक बेबीलोन के शक्तिशाली सम्राट नबुकिडिनजर को परास्त कर उसकी पुत्री हर्यक (हरिण्य अर्थात स्वर्णमयी) से विवाह कर ईसा पूर्व 570 में लाये थे। बेबीलोन (वर्तमान ईराक) के यूफ्रिटिस और टिग्रिस नदियों के मध्यवर्ती इलाके के तत्कालीन शाकद्वीप क्षेत्र में स्थित रहा है और यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक महत्व का क्षेत्र है।
जैन संस्कृति का इतिहास बताता है कि ईसा पूर्व लगभग 578 (लगभग 2578 वर्ष पूर्व) मगध के शासनाध्यक्ष अश्वसेन और उनके पुत्र पाश्र्व वीरभट्टारक के नेतृत्व में मगध के क्षत्रपों की ताकतवर सेना ने बेबीलोन पर वर्तमान ईरान के रास्ते हमला किया था। मगध की सेना और बेबीलोन के सम्राट नबुकिडिनजर की सेनाओं में चार साल तक भयंकर युद्ध चला और इसमें राजा अश्वसेन मारे गये तथा बेबीलोन के शासक नबुकिडिनजर को करारी शिकस्त मिली! पराजित बेबीलोन के शासक नबुकिडिनजर ने युद्ध के दौरान अश्वसेन के युद्ध में वीर गति प्राप्त होने के बाद मगध के सम्राट बने पाश्र्व वीरभट्टारक की आधीनता स्वीकार कर ली और अपनी पुत्री हर्यक (हरिण्य अर्थात स्वर्णमयी) जिसे जैन संस्कृति में प्रभा सुन्दरी व प्रभावती के नाम से जाना गया है, का विवाह पाश्र्व वीरभट्टारक से कर दिया। पाश्र्व वीरभट्टारक अपनी पत्नी हर्यक (प्रभा सुन्दरी-प्रभावती) और हजारों टन सोना व अन्य मूल्यवान वस्तु भण्डार लेकर ईसापूर्व 570 में वापस मगध (भारत) लौटे। जहां उन्हें तीर्थंकर (विराट चक्रवर्ती शासनाध्यक्ष) की पदवी से अलंकरित किया गया।
पाश्र्व वीरभट्टारक द्वारा युद्ध में जीती गई बेबीलोन, ईरान, सीरिया, मिश्र (अफ्रीका) क्षेत्रों से प्राप्त स्वर्ण, स्वर्ण प्रतिमायों और बहुमूल्य वस्तुओं के भंडार को मगध राजकोष में शामिल कर लिया गया। इस अकूत स्वर्ण भण्डार को पांच गोपनीय स्थानों पर रखा गया था और उन स्थानों का नाम सोन भण्डार रखा गया। जैन इतिहास और जैन श्रुति में इन सोन भण्डारों का उल्लेख कई स्थानों पर आता है।
ईसा पूर्व 543 में तीर्थंकर पाश्र्व वीरभट्टारक का 70 वर्ष की आयु में देहान्त हो गया। उसके बाद उनकी पत्नी हर्यक (प्रभा सुन्दरी-प्रभावती) के सानिध्य में पाश्र्व वीरभट्टारक के पुत्र बिम्बीसार को 15 साल की अल्प आयु में मगध की राजगद्दी पर आसीन किया गया।
अगर भारतीय इतिहासकारों की माने तो यहीं से हर्यक वंश का प्रारम्भ हुआ है। प्राचीन भारत के इतिहास का गहराई से अध्ययन किय जाये तो उसमें उल्लेखित हर्यक वंश के लिये प्रसिद्ध है कि इस वंश के शासक पितृहंता (पिता को अपदस्थ कर या मार कर) शासक होते थे। आज भी कॉलेजों में स्नातक एवं अधिस्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के प्राचीन भारत के इतिहास खण्ड में हर्यक वंश का उल्लेख आता है।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित डोडिया खेड़ा गांव आज लगभग एक सौ परिवारों की बस्ती है और यहां के लोगों को अपने प्राचीन इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
जिस साधु शोभन सरकार को खजाने के बारे में सपना आया है, उसके मुताबिक यहां सिर्फ एक हजार टन सोना ही नहीं है, बल्कि इस कथित स्वर्ण भंडार के पास ही पांच हजार टन सोना ओर भी हो सकता है।
इससे साफ जाहिर होता है कि अगर इतनी मात्रा में स्वर्ण, स्वर्ण आभूषण, स्वर्ण मूर्तियां निकलती है तो ये खजाना ईसा पूर्व 570 (2578 वर्ष पूर्व) का पाश्र्व वीरभट्टारक के शासनकाल का बेबीलोन से लाकर मगध राज्य के राजकोष में जमा किये गये खजाने का एक हिस्सा है।
अगर हकीकत में उन्नाव के पास डोडिया खेड़ा गांव के बाहर गंगानदी के तट पर स्थित इस किले के प्रांगण से यह खजाना निकलता है, तो यह राष्ट्रीय पुराधरोहर होने के साथ-साथ जैन संस्कृति के अनुयाइयों की सम्पत्ति होगी, जिन्होंने बेबीलोन (ईराक), ईरान, सीरिया, मिश्र (अफ्रीका) जाकर प्रचण्ड संघर्ष किया और यह खजाना अर्जित कर भारत लाये तथा इसे सहेजा! वहीं क्षेत्र के किसी भी राजा-महाराजा के पास इतना खजाना कभी भी नहीं रहा है।
डोडिया गांव के पास गंगानदी के किनाने स्थित इस किले के प्रांगण से खजाना निकलता है तो यह जैन संस्कृति के इतिहास को भी परत-दर-परत खोलेगा और इसके बाद पाश्र्व वीरभट्टारक से चलते हुए नेमीनाथ, मल्लिकानाथ होते हुए हमारे आदिपुरूष ऋषभदेव तक के जिन संस्कृति के इतिहास को उजागर करेगा।

 
AGRAGAMI SANDESH

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