पूंजीपतियों और उनके दलालों की लयताल से जैन समुदाय की एकता के पाखण्डियों की पाखण्डपूर्ण करतूतों को आखीर जैन समुदाय ने ही लगभग विराम लगा दिया है।
गत शनिवार को स्थानीय रामलीला मैदान में समग्र दिगम्बर समाज का क्षमावणी पर्व उल्लास के साथ मनाया गया। इस ही दिन दिगम्बर जैन समुदाय ने अपने 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ का जन्म कल्याणक (जन्म दिन) भी मनाया। मुनि तरूण सागर ने भी उसमें शिरकत की!
उधर दिगम्बर और श्वेताम्बर एकता का पाखण्ड रचने वाले पूंजीपतियों और उनके पुछल्लों ने मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रथ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर की अगुआई में सुबोध स्कूल रामबाग सर्किल पर सामुहिक क्षमापना कार्यक्रम आयोजित किया। जैसे कि समग्र जैन समाज के स्वंयभूं ठेकेदार वे ही हों! चूंकि कार्यक्रम के पश्चात् सामुहिक भोजन की व्यवस्था थी, इसलिये भीड़ होना स्वभाविक ही था।
लेकिन श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड करने वाले पूंजीपतियों सरमायेदारों और उनके पुछल्लों से एक सीधा-सीधा सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि जैसा वे दावा करते रहे हैं कि उनकी श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता की मुहिम परवान चढ़ी, तो फिर गत शनिवार को राजस्थान जैन सभा के सानिध्य में रामलीला मैदान में समग्र दिगम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित क्षमावणी से सम्बन्धित अलग से जो विशाल कार्यक्रम हुआ, उसने क्या जैन समाज से अलग-थलग पड़े इन पूंजीपतियों-सरमायेदारों और उनके पुछल्लों की दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता के पाखण्ड की बखिया उधेड़ कर नहीं रख दी?
श्वेताम्बर-दिगम्बर का पाखण्ड करने वाले बतायें कि अगर उनकी मुहिम परवान चढ़ी तो फिर रामलीला मैदान में राजस्थान जैन सभा जो कि दिगम्बर जैन समाज की राजस्थान में सर्वोच्च संस्था है, के सानिध्य में शनिवार को रामलीला मैदान में जो समग्र दिगम्बर जैन समुदाय का सामुहिक क्षमावणी दिवस मना वह उनकी नजर में क्या है? यह कार्यक्रम अलग से क्यों आयोजित हुआ? यह कार्यक्रम ही श्वेताम्बर-दिगम्बर के पाखण्ड की कलई खोलकर रख रहा है।
मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर जिनके सानिध्य में श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता का पाखण्ड कुछ पूंजीपति सरमायेदार और उनके दुमछल्ले कर रहे हैं उनसे भी हमारा सीधा सवाल है कि उनकी नजर में सिर्फ उनका अहम या गुरूर ही महत्व रखता है? क्या वे ही जैन समुदाय के एकमात्र तथाकथित सर्वेसर्वा मठाधीश हैं? राजस्थान जैन सभा सहित जैन समुदाय के अन्य सामाजिक संगठन क्या उनके आगे गौण हैं? अगर वे ऐसा सोचते हैं और उन्हें इसका गुरूर है, तो उन्हें जैन संस्कृति और धर्म के सानिध्य में ली गई दीक्षा का त्याग कर सामान्य कथावाचकों की तरह अपनी दुकान सजा लेनी चाहिये! वैसे भी जैन संस्कृति/धर्म में सन्यासियों के लिये उल्लेखित व्रतों/नियमों का उलंघन कर डनलप (स्पंज) के गद्दे, तकियों के सहारे आराम की जिंदगी जीने वालों के लिये जैन संस्कृति/धर्म में कोई स्थान नहीं है!
दु:खद स्थिति यह है कि जैन समुदाय में चार्तुमास के साथ-साथ पर्युषण पर्व एवं दसलक्षण पर्व अत्यन्त महत्व के पर्व होते हैं। इन पर्वों के दौरान व्यक्ति अपने आप को सभी कषायों से मुक्ति दिला कर निर्मल करने का पूरा प्रयास करता है। अब हम इन से फिर एक सीधा-सीधा सवाल कर सकते हैं कि वे खुद बतायें कि पर्वाधिराज पर्युषण पर्व और दसलक्षण पर्व के दौरान व अब तक की चार्तुमास अवधि में उनका जो व्यवहार, आचार-विचार रहा वह क्या जैन संस्कृति/धर्म और उसमें उल्लेखित व्रतों/नियमों के अनुकूल है? क्या वे जैन संस्कृति/धर्म के स्थापित निर्देशों और आदेशों की पालना करते हैं? यदि नहीं तो उन्हें क्या हक है जैन संस्कृति/धर्म व उसके आधीन मत-पंथों का सहारा लेने का?
आज जैन समुदाय का आम समाज बन्धु, जिसमें हम भी शामिल हैं, यह महसूस करने लगा है कि श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता के पाखण्ड की आड़ में मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर अलग से सजी अपनी दुकानों में भीड़ जुटाने में लगे हैं।
हम अपने पिछले कथन को फिर दोहराना चाहेंगे कि जो व्यक्ति अपने परिजनों व समाज का सांसारिक त्याग कर सन्यासी बन जाता है, उसमें अगर प्राप्ति की लालसा पनपती है तो फिर सन्यास असफल हो जाता है और उस सन्यासी को तत्काल सन्यास त्याग आम कथावाचक बन जाना चाहिये। क्या हमारे सन्यासी मंथन करेंगे?
गत शनिवार को स्थानीय रामलीला मैदान में समग्र दिगम्बर समाज का क्षमावणी पर्व उल्लास के साथ मनाया गया। इस ही दिन दिगम्बर जैन समुदाय ने अपने 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ का जन्म कल्याणक (जन्म दिन) भी मनाया। मुनि तरूण सागर ने भी उसमें शिरकत की!
उधर दिगम्बर और श्वेताम्बर एकता का पाखण्ड रचने वाले पूंजीपतियों और उनके पुछल्लों ने मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रथ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर की अगुआई में सुबोध स्कूल रामबाग सर्किल पर सामुहिक क्षमापना कार्यक्रम आयोजित किया। जैसे कि समग्र जैन समाज के स्वंयभूं ठेकेदार वे ही हों! चूंकि कार्यक्रम के पश्चात् सामुहिक भोजन की व्यवस्था थी, इसलिये भीड़ होना स्वभाविक ही था।
लेकिन श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड करने वाले पूंजीपतियों सरमायेदारों और उनके पुछल्लों से एक सीधा-सीधा सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि जैसा वे दावा करते रहे हैं कि उनकी श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता की मुहिम परवान चढ़ी, तो फिर गत शनिवार को राजस्थान जैन सभा के सानिध्य में रामलीला मैदान में समग्र दिगम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित क्षमावणी से सम्बन्धित अलग से जो विशाल कार्यक्रम हुआ, उसने क्या जैन समाज से अलग-थलग पड़े इन पूंजीपतियों-सरमायेदारों और उनके पुछल्लों की दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता के पाखण्ड की बखिया उधेड़ कर नहीं रख दी?
श्वेताम्बर-दिगम्बर का पाखण्ड करने वाले बतायें कि अगर उनकी मुहिम परवान चढ़ी तो फिर रामलीला मैदान में राजस्थान जैन सभा जो कि दिगम्बर जैन समाज की राजस्थान में सर्वोच्च संस्था है, के सानिध्य में शनिवार को रामलीला मैदान में जो समग्र दिगम्बर जैन समुदाय का सामुहिक क्षमावणी दिवस मना वह उनकी नजर में क्या है? यह कार्यक्रम अलग से क्यों आयोजित हुआ? यह कार्यक्रम ही श्वेताम्बर-दिगम्बर के पाखण्ड की कलई खोलकर रख रहा है।
मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर जिनके सानिध्य में श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता का पाखण्ड कुछ पूंजीपति सरमायेदार और उनके दुमछल्ले कर रहे हैं उनसे भी हमारा सीधा सवाल है कि उनकी नजर में सिर्फ उनका अहम या गुरूर ही महत्व रखता है? क्या वे ही जैन समुदाय के एकमात्र तथाकथित सर्वेसर्वा मठाधीश हैं? राजस्थान जैन सभा सहित जैन समुदाय के अन्य सामाजिक संगठन क्या उनके आगे गौण हैं? अगर वे ऐसा सोचते हैं और उन्हें इसका गुरूर है, तो उन्हें जैन संस्कृति और धर्म के सानिध्य में ली गई दीक्षा का त्याग कर सामान्य कथावाचकों की तरह अपनी दुकान सजा लेनी चाहिये! वैसे भी जैन संस्कृति/धर्म में सन्यासियों के लिये उल्लेखित व्रतों/नियमों का उलंघन कर डनलप (स्पंज) के गद्दे, तकियों के सहारे आराम की जिंदगी जीने वालों के लिये जैन संस्कृति/धर्म में कोई स्थान नहीं है!
दु:खद स्थिति यह है कि जैन समुदाय में चार्तुमास के साथ-साथ पर्युषण पर्व एवं दसलक्षण पर्व अत्यन्त महत्व के पर्व होते हैं। इन पर्वों के दौरान व्यक्ति अपने आप को सभी कषायों से मुक्ति दिला कर निर्मल करने का पूरा प्रयास करता है। अब हम इन से फिर एक सीधा-सीधा सवाल कर सकते हैं कि वे खुद बतायें कि पर्वाधिराज पर्युषण पर्व और दसलक्षण पर्व के दौरान व अब तक की चार्तुमास अवधि में उनका जो व्यवहार, आचार-विचार रहा वह क्या जैन संस्कृति/धर्म और उसमें उल्लेखित व्रतों/नियमों के अनुकूल है? क्या वे जैन संस्कृति/धर्म के स्थापित निर्देशों और आदेशों की पालना करते हैं? यदि नहीं तो उन्हें क्या हक है जैन संस्कृति/धर्म व उसके आधीन मत-पंथों का सहारा लेने का?
आज जैन समुदाय का आम समाज बन्धु, जिसमें हम भी शामिल हैं, यह महसूस करने लगा है कि श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता के पाखण्ड की आड़ में मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर अलग से सजी अपनी दुकानों में भीड़ जुटाने में लगे हैं।
हम अपने पिछले कथन को फिर दोहराना चाहेंगे कि जो व्यक्ति अपने परिजनों व समाज का सांसारिक त्याग कर सन्यासी बन जाता है, उसमें अगर प्राप्ति की लालसा पनपती है तो फिर सन्यास असफल हो जाता है और उस सन्यासी को तत्काल सन्यास त्याग आम कथावाचक बन जाना चाहिये। क्या हमारे सन्यासी मंथन करेंगे?


