पिछले दिनों दिगम्बर जैन समुदाय के विभिन्न संगठनों के पचास से ज्यादा प्रबुद्धजन नारायण सिंह सर्किल स्थित दिगम्बर जैन नसियां जहां कि मुनि तरूण सागर का चार्तुमास आवास है, पर जा पहुंचे और सुबोध पब्लिक स्कूल प्रांगण में जैन समुदाय के शाकहारी-मांसाहारी विभाजन से सम्बन्धित उनके प्रवचन के अंशों पर नाराजगी जताई। इससे पूर्व जयपुर महानगर के ज्योतिषी भी ज्योतिषियों से सम्बन्धित मुनि तरूण सागर के प्रवचन पर नाराजगी प्रगट कर चुके हैं। दोनों ही प्रकरणों में मुनि तरूण सागर की यही रट रही कि उनके कथन को गलत ढंग से समझा गया। उन्हें सही अर्थों में नहीं लिया गया!
दरअसल श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता की पाखण्ड पूर्ण नौटंकी में उलझे मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर कुल मिलाकर जैन समुदाय से लगभग पूरी तरह से कटे हुए हैं। इनके इर्दगिर्द पूंजीपति चाट्टूकारों का घेरा बना हुआ है। वे इनकी दौलत का इस्तेमाल कर अपनी कथामण्डली जमाने की जुगत बैठाने के अलावा कुछ भी करने का सोच नहीं रखते हैं। इनकी पहुंच आम जैन समुदाय के बीच शून्य से ज्यादा नहीं है। जैन समुदाय के बीच इन की पैठ का तो सवाल ही नहीं उठता है।
जिसे मुनि तरूण सागर कड़वे प्रवचन की संज्ञा देते हैं उनके वे प्रवचन आम जैन समुदाय के सदस्यों के गले नहीं उतरते हैं। हमने मुनित्रय के पिछले दो महिनों में दिये गये प्रवचनों का गहराईे अध्ययन किया। जैन समुदाय के प्रबुद्धजनों में (पूंजीपतियों ने नहीं) चर्चा की तो लब्बो-लबाब यही रहा कि इन प्रवचनभट्टो का हकीकत में समाज के सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक उत्थान से दूर तक कोई लेनादेना नहीं है। चार्तुमास के पावन अवसर पर पिछले दो महिनों में मुनित्रय पूंजीपतियों सरमायेदारों के आसरे पांडाल सजा कर प्रवचन देते रहे। कुछ कड़वे कुछ लच्छेदार कुन मनभाव प्रवचनों का उनका दौर खत्म हो गया। सजा हुआ पांडाल खुलकर वापस टैंट हाऊस वाले के गोदाम में पहुंच गया है। लेकिन उनके प्रवचनों का आम जैन समुदाय के सदस्यों पर क्या असर हुआ? इसका जवाब तो दें हमारे प्रवचनभट्ट मुनित्रय! हम पिछले दो महिनों में यह सवाल कई बार उठा चुके हैं, लेकिन इसका जवाब इन प्रचनभट्ट मुनित्रय के पास नहीं है!
रामबाग सर्किल पर स्थित सुबोध पब्लिक स्कूल परिसर में बने बालीबाल ग्राउण्ड पर सजे टैंट में मुनि तरूण सागर ने जिस तरह जैन समुदय को शाहकारी-मांसहारी वर्ग में विभाजित करने की मानसिकता दिखाई वह अत्यन्त खेदजनक है। लेकिन दु:खद स्थिति यह रही कि मुनि जी का जैन संस्कृति से सम्बन्धित अल्पज्ञान उजागर हो गया। प्रवचन कड़वे हों या मीठे, हमारे सन्यासियों को प्रवचन देने से पहिले प्रवचन से सम्बन्धित विषय वस्तु पर जैन संस्कृति से जुड़े ग्रंथों और साहित्य का गहनता से अध्ययन कर फिर उसमें से तत्वों का विवेचन कर उन्हें अपने प्रवचनों का भाग बनाना चाहिये। चटपटे मिर्च मसाले जैसे शब्दों से युक्त आधारहीन मुद्दों पर प्रवचन देने से बचना चाहिये!
बचपन की कुछ यादें आज भी हमारे मानस पटल पर अंकित हैं। हम जब पहली बार उपाध्याय प्रवर सुखसागर जी के पास मांगलिक सुनने गये थे, तब उन्होंने सस्नेह मांगलिक सुनाई, वासक्षेप से हमें उपकृत किया और कुछ सवाल किये। हमने जवाव दिये! संतुष्ट होने के बाद उनका सवाल था कि चार्तुमास में हरी सब्जियां खाते हो? हमने हां में जवाब दिया। हमारा जवाब सुनकर उन्होंने चार्तुमास के दौरान हरी सब्जियां खाने के बारे में विस्तार से वैज्ञानिक-सामाजिक और आध्यात्मिक उदाहरण देकर हमें हरी सब्जियां नहीं खाने के लिये प्रेरित किया। उनके विचारों और तर्कों ने हमारे मानस पटल पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला और हमने चार्तुमास अवधि में हरी सब्जियां, आलू एवं चावल नहीं खाने का संकल्प उनके सामने लियाा। न तो उन्होंने कड़वा प्रवचन दिया और नही मीठा!
यह एक ही उदाहरण नहीं है, हमारे मानस पटल पर जैन आचार्यों, उपाचार्यों, साधुओं और साध्वियों द्वारा अपने श्रावकों को त्याग के लिये प्रेरित करने के अनेक उदाहरण अंकित हैं। दायीत्वों के निर्वहन के लिये प्रेरित करने के सैंकडों प्रसंग अंकित हैं। लेकिन जिन्होंने परिवार का त्याग कर अपना और अपने समाज के कल्याण का बीड़ा उठाया, वे सन्यासी ही अगर पथभ्रष्ट हो जायें, सेठों के बेनामी-कालेधन का सहारा लेकर अपनी प्रवचनशैली को चमकाने में ध्यान दें और भूल जायें समाज के सामाजिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक उत्थान करने की जुम्मेदारी, तो फिर ऐसे में क्यों आम जैन समुदाय के सदस्य उनसे जुड़े?
एक बात हमारे सन्यासियों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि दौलत-शोहरत से बड़ा त्याग, नैतिकता और मानवता के प्रति समर्पण है। इसाई ननो और सन्यासियों (जिन्हें फादर/ब्रदर के नाम से जाना जाता है) के मानवता के प्रति समर्पण से हमारे सन्यासी कोई सबक ले सकें तो फिर उन्हें कड़वे या मीठे प्रवचनों का सहारा लेने की जरूरत ही नहीं होगी।
क्या जैन संस्कृति के ऋषभदेव के मानवधर्म सूत्र से मार्गदर्शन ले कर जैन समुदाय के सन्यासी अपने पथ पर अग्रसर होंगे। यदि हां तो फिर उन्हें श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता की पाखण्डपूर्ण नौटंकी का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
दरअसल श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता की पाखण्ड पूर्ण नौटंकी में उलझे मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर कुल मिलाकर जैन समुदाय से लगभग पूरी तरह से कटे हुए हैं। इनके इर्दगिर्द पूंजीपति चाट्टूकारों का घेरा बना हुआ है। वे इनकी दौलत का इस्तेमाल कर अपनी कथामण्डली जमाने की जुगत बैठाने के अलावा कुछ भी करने का सोच नहीं रखते हैं। इनकी पहुंच आम जैन समुदाय के बीच शून्य से ज्यादा नहीं है। जैन समुदाय के बीच इन की पैठ का तो सवाल ही नहीं उठता है।
जिसे मुनि तरूण सागर कड़वे प्रवचन की संज्ञा देते हैं उनके वे प्रवचन आम जैन समुदाय के सदस्यों के गले नहीं उतरते हैं। हमने मुनित्रय के पिछले दो महिनों में दिये गये प्रवचनों का गहराईे अध्ययन किया। जैन समुदाय के प्रबुद्धजनों में (पूंजीपतियों ने नहीं) चर्चा की तो लब्बो-लबाब यही रहा कि इन प्रवचनभट्टो का हकीकत में समाज के सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक उत्थान से दूर तक कोई लेनादेना नहीं है। चार्तुमास के पावन अवसर पर पिछले दो महिनों में मुनित्रय पूंजीपतियों सरमायेदारों के आसरे पांडाल सजा कर प्रवचन देते रहे। कुछ कड़वे कुछ लच्छेदार कुन मनभाव प्रवचनों का उनका दौर खत्म हो गया। सजा हुआ पांडाल खुलकर वापस टैंट हाऊस वाले के गोदाम में पहुंच गया है। लेकिन उनके प्रवचनों का आम जैन समुदाय के सदस्यों पर क्या असर हुआ? इसका जवाब तो दें हमारे प्रवचनभट्ट मुनित्रय! हम पिछले दो महिनों में यह सवाल कई बार उठा चुके हैं, लेकिन इसका जवाब इन प्रचनभट्ट मुनित्रय के पास नहीं है!
रामबाग सर्किल पर स्थित सुबोध पब्लिक स्कूल परिसर में बने बालीबाल ग्राउण्ड पर सजे टैंट में मुनि तरूण सागर ने जिस तरह जैन समुदय को शाहकारी-मांसहारी वर्ग में विभाजित करने की मानसिकता दिखाई वह अत्यन्त खेदजनक है। लेकिन दु:खद स्थिति यह रही कि मुनि जी का जैन संस्कृति से सम्बन्धित अल्पज्ञान उजागर हो गया। प्रवचन कड़वे हों या मीठे, हमारे सन्यासियों को प्रवचन देने से पहिले प्रवचन से सम्बन्धित विषय वस्तु पर जैन संस्कृति से जुड़े ग्रंथों और साहित्य का गहनता से अध्ययन कर फिर उसमें से तत्वों का विवेचन कर उन्हें अपने प्रवचनों का भाग बनाना चाहिये। चटपटे मिर्च मसाले जैसे शब्दों से युक्त आधारहीन मुद्दों पर प्रवचन देने से बचना चाहिये!
बचपन की कुछ यादें आज भी हमारे मानस पटल पर अंकित हैं। हम जब पहली बार उपाध्याय प्रवर सुखसागर जी के पास मांगलिक सुनने गये थे, तब उन्होंने सस्नेह मांगलिक सुनाई, वासक्षेप से हमें उपकृत किया और कुछ सवाल किये। हमने जवाव दिये! संतुष्ट होने के बाद उनका सवाल था कि चार्तुमास में हरी सब्जियां खाते हो? हमने हां में जवाब दिया। हमारा जवाब सुनकर उन्होंने चार्तुमास के दौरान हरी सब्जियां खाने के बारे में विस्तार से वैज्ञानिक-सामाजिक और आध्यात्मिक उदाहरण देकर हमें हरी सब्जियां नहीं खाने के लिये प्रेरित किया। उनके विचारों और तर्कों ने हमारे मानस पटल पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला और हमने चार्तुमास अवधि में हरी सब्जियां, आलू एवं चावल नहीं खाने का संकल्प उनके सामने लियाा। न तो उन्होंने कड़वा प्रवचन दिया और नही मीठा!
यह एक ही उदाहरण नहीं है, हमारे मानस पटल पर जैन आचार्यों, उपाचार्यों, साधुओं और साध्वियों द्वारा अपने श्रावकों को त्याग के लिये प्रेरित करने के अनेक उदाहरण अंकित हैं। दायीत्वों के निर्वहन के लिये प्रेरित करने के सैंकडों प्रसंग अंकित हैं। लेकिन जिन्होंने परिवार का त्याग कर अपना और अपने समाज के कल्याण का बीड़ा उठाया, वे सन्यासी ही अगर पथभ्रष्ट हो जायें, सेठों के बेनामी-कालेधन का सहारा लेकर अपनी प्रवचनशैली को चमकाने में ध्यान दें और भूल जायें समाज के सामाजिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक उत्थान करने की जुम्मेदारी, तो फिर ऐसे में क्यों आम जैन समुदाय के सदस्य उनसे जुड़े?
एक बात हमारे सन्यासियों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि दौलत-शोहरत से बड़ा त्याग, नैतिकता और मानवता के प्रति समर्पण है। इसाई ननो और सन्यासियों (जिन्हें फादर/ब्रदर के नाम से जाना जाता है) के मानवता के प्रति समर्पण से हमारे सन्यासी कोई सबक ले सकें तो फिर उन्हें कड़वे या मीठे प्रवचनों का सहारा लेने की जरूरत ही नहीं होगी।
क्या जैन संस्कृति के ऋषभदेव के मानवधर्म सूत्र से मार्गदर्शन ले कर जैन समुदाय के सन्यासी अपने पथ पर अग्रसर होंगे। यदि हां तो फिर उन्हें श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता की पाखण्डपूर्ण नौटंकी का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।


