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जैन समाज की एकता के दावों की निकली हवा!-5

जयपुर (अग्रगामी) श्वेताम्बर खरतरगच्छ एकता की नौटंकी के पाखण्ड की आड़ में मुनि तरूण सागर ने ज्योतिषियों पर जो टिप्पणी की वह जयपुर के ज्योतिषियों को रास नहीं आई और जा धमके नारायण सिंह सर्किल स्थित भट्टारक जी की नसियां में मुनि तरूण सागर से रूबरू होकर विरोध प्रगट करने!

अग्रगामी संदेश ने मुनि तरूण सागर, महोपाध्याय ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर की श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता के पाखण्ड की असलियत उजागर की थी। नतीजन पिछले कई दिनों से इन भाषणभट्ट संतों के पांडाल में आने वाले श्रोताओं की संख्या घटती ही जा रही थी। पांडाल में भीड़ नहीं जुटने से परेशान मुनि तरूण सागर ने गत बुद्धवार को भीड़ जुटाने के लिये एक कड़वा प्रवचन दे दिया कि ज्योतिषि और तांत्रिक को घर में नहीं आने दिया जाये नतीजन जयपुर के लगभग दो दर्जन ज्योतिषी मुनि तरूण सागर के चातुर्मास आवास स्थल पर जा धमके और अपनी गहरी नाराजगी जताई। मुनि तरूण सागर उन्हें अपनी सफाई देते रहे, लेकिन इस हकीकत से तो इन्कार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने जो कुछ कहा वह अनुचित था!

सवाल उठता है कि नक्षत्र विज्ञान एवं ज्योतिष ज्ञान के बारे में मुनि तरूण सागर का खुद का कितना अध्ययन एवं संचित ज्ञान है? जहां तक उन के प्रवचनों का विश्लेषण किया जाये तो वे जैन संस्कृति (जिन संस्कृति) के इतिहास से लगभग अनभिज्ञ हैं। उन्हें जिन संस्कृति के पांच हजार साल पुराने इतिहास के कखहरे की भी शायद जानकारी नहीं है! लगता है कि उन्होंने जैन संस्कृति के इतिहास के अध्ययन की कभी कोई कोशिश ही नहीं की!

अगर उन्हें ऋषभदेव से पाश्र्ववीरभट्ट तक तेवीस तीर्थंकरों के समकालीन इतिहास की जानकारी होती तो ज्योतिष विज्ञान के बारे में इस तरह का प्रवचन नहीं देते! यहां एक तथ्य ओर भी विचारणीय है कि प्रवचनभट्ट होना एक बात है जबकि विषय पर अध्ययन एवं उसमें पारंगता दूसरी बात है। क्या मुनि तरूण सागर ने नक्षत्र विज्ञान और ज्योतिष विज्ञान का अध्ययन किया है? अगर अध्ययन नहीं किया है तो उस विषय पर प्रवचन करना गैरजुम्मेदारान कृत्य है।

विज्ञापनों की बरसात के साथ बड़े जोरशोर से महोपाध्याय ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर के प्रवचन कराने वालों ने श्वेताम्बर और दिगम्बर एकता का पाखण्डपूर्ण धुंआधार प्रचार करवा कर पांडाल में भीड़ जुटाने की नौटंकी जरूर की थी। लेकिन उनकी प्रबुद्ध श्रोताओं के आगे दाल नहीं गली और छुट्टी के दिन शनिवार और इतवार (रविवार) को छोड़ कर अन्य पांच दिन आयोजक और प्रवचनभट्ट मुनिजन श्रोताओं की भीड़ इंतजार करते नजर आते हैं। पिछले सोलह दिनों में मुनि तरूण सागर, महोपाध्याय ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर ने दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता के किसी भी सार्थक प्रयास के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है! आखिर क्यों? जिस एकता के मुद्दे को लेकर मुनित्रय ने एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउण्ड पर अपना पांडाल सजवाया, वे आखीर जैन एकता पर ऐतिहासिक सक्षम जानकारी के साथ अपने प्रवचन देने से क्यों कतरा रहे हैं?

जीवन निर्माण, कैरियर निर्माण, परिवार, स्वास्थ्य, धर्म, समाज निर्माण मुद्दों पर कड़वे प्रवचनों के बीच, हमारे प्रवचनभट्ट मुनित्रय अपनी शैली में आध्यात्मिक प्रवचन और दिव्य सत्संग कर रहे हैं। लेकिन इन मुद्दों पर तो मंत्री से लेकर उनके राजनैतिक छुटभय्या रोज ही किसी गांव, शहर में अपना प्रवचननुमा भाषण झाड़ते रहते हैं, अवाम इस कान से सुनता है और उस कान से निकाल देता है। लेकिन सवाल उठता है कि जिस (श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता) मुद्दे को लेकर भारी शोर-शराबे के बीच उनके प्रवचन शुरू हुए वह मुद्दा आज सोलह दिन बीत जाने के बाद भी उनकी आईटनरी से गायब है! यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड करोड़ों की धन राशि बटोरने मात्र के लिये ही किया गया था? आयोजकों को बताना होगा कि इस आयोजन के लिये उन्होंने आम श्रावकों से तथा पूंजीपति, सरमायेदारों से कितना धन बटोरा और उसके व्यय का क्या हिसाब है?

खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने इस एकता के पाखण्ड की कटुशब्दों में निंदा करते हुए मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर से भी सवाल किया है कि उन्होंने खरतरगच्छाचार्य जिन कैलाश सूरिश्वर जी की आज्ञा और उनके निर्देशानुसार जयपुर में निर्धारित स्थल विचक्षण भवन में चार्तुमास आवास क्यों नहीं किया? उन्होंने 64, जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर स्थित संतोषचंद्र झाड़चूर के आवास में ठहरने का फैसला क्यों और किस धार्मिक एवं सामाजिक मान्यता के तहत किया? मंच ने यह सवाल भी उठाया है कि अगर मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर का यह कदम शास्त्र सम्मत नहीं है तो क्या इसे धार्मिक मान्यताओं के विपरीत माना जाये? इस यक्ष प्रश्र का जवाब तो मुनि द्वय को देना ही होगा!

 
AGRAGAMI SANDESH

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AGEAGAMI SANDESH

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