नाकोडा तीर्थ संस्थापक व प्रतिष्ठापक खरतरगच्छाचार्य श्री जिन कीर्तिसूरि की परम्परा में आचार्य जिन कृष्णचन्द्ररसूरि के शिष्य उपाध्याय श्री सुखसागर जी के लद्यु शिष्य एवं जैन संस्कृति के विद्वान महान पुरातत्ववेत्ता एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित व प्रसिद्ध ग्रन्थों खण्डहरों का वैभव तथा खोज की पगडण्डियां सहित धातु प्रतिमा लेख, सईकी, एकलिंग जी का इतिहास, शत्रुंजय तीर्थ व अन्य सैंकडों प्रकाशित व अप्रकाशित ग्रंथों, रचनाओं के रचनाकार परम आदरणीय मुनि कान्तिसागर जी के मोहनबाडी स्थित समाधि स्थल को अत्यन्त गैर जुम्मेदारान तरीके से विलोपित करने की कुचेष्ठा की गई है और भारी विरोध के बाद श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की साधारण सभा में इसके पुन: निर्माण के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्णय भी हुआ! उस ही परिपेक्ष्य में तत्कालीन संघमंत्री नवरत्नमल श्रीश्रीमाल ने परम आदरणीय मुनि कान्तिसागर जी के चरण मोहनबाडी में पुन: स्थापित करने के लिये स्पष्ट आश्वासन दिनांक 13 अप्रेल, 2009 को संघ कार्यालय में प्रधान सम्पादक हीराचंद जैन को दिया था!
उल्लेखनीय है कि इस सम्बन्ध में तत्कालीन संघमंत्री स्वर्गीय उत्तमचंद बडेर के संघमंत्रित्व काल की अन्तिम साधारण सभा में भी हीराचंद जैन द्वारा प्रस्ताव रखने के तत्काल बाद स्वर्गीय उत्तमचंद बडेर ने स्पष्ट घोषणा की थी कि परम आदरणीय मुनि कान्तिसागर जी के क्षतिग्रस्त समाधि स्थल का पुन: निर्माण कराया जायेगा। स्थल का चयन हीराचंद जैन (बुरड़) से विचार विमर्श कर तैय कर लिया जायेगा। साधारण सभा में अध्यक्ष श्रीमती जतन कंवर गोलेछा, विमलचंद सुराना, उत्तमचंद बडेर (अब स्वर्गीय) सहित संघ की तत्कालीन कार्यकारिणी के अधिकांश पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद थे। हालांकि साधारण सभा के कार्यवाही रजिस्टर में मनमाने तरीके से अधूरा विवरण ही लिखा गया था और अब तो शर्मनाक तरीके से समाधि स्थल को ही विलोपित कर दिया गया है!
अगर पूंजीपतियों में भुलक्कडपन हो तो हम उन्हें पुन: यह भी याद दिला दें कि इस ही मुद्दे पर इसके पहिले विमलचंद सुराना के आग्रह पर उनके कार्यालय में ही एक मीटिंग हुई थी, जिसमें स्वंय विमलचंद सुराना, उत्तमचंद बडेर (अब स्वर्गीय) मौजूद थे और हीराचंद जैन को विशेष रूप से बुलाया गया था। अन्य कुछ महानुभव भी इस बैठक में मौजूद थे। इस मीटिंग में भी परम आदरणीय मुनि श्री कान्तिसागर जी के समाधि स्थल के पुन: निर्माण पर स्पष्ट सहमति हुई थी। स्वर्गीय उत्तमचंद बडेर सहित तत्कालीन कार्यकारिणी के कई पदाधिकारियों ने मौके पर जाकर परम आदरणीय मुनि कान्तिसागर जी के समाधि स्थल की दुर्दशा स्वंय देखी थी और तत्काल संघ की गलतियों को दुरूस्त करने का आश्वासन दिया था। लेकिन विमलचंद सुराना व कुछ अन्य धन्नासेठों के दबाव में आकर समाधि स्थल का पुर्ननिर्माण नहीं करवाया गया जबकि अपने परिचितों के आवास हेतु गैस्ट हाऊस का निर्माण एवं अन्य अप्रासंगिक कार्य करवाये गये एवं करवाये जा रहे हैं। शर्मनाक स्थिति यह रही कि मुनि कान्तिसागर जी की दाहसंस्कार स्थल पर अब आलीशान मंदिर बनवाया जा रहा है, इन्ही सुराना बंधुओं के निर्देशन में!
समाज के हर सदस्य को हार्दिक मानवीय पीडा से त्रस्त करने वाले, महान विद्वान प्रखर वक्ता जैन संस्कृति के पुरोधा, वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता परम आदरणीय मुनि कान्तिसागर जी के समाधि स्थल निर्माण के मसले में पुन: कई वादे तत्कालीन संघमंत्री नवरत्नमल श्रीश्रीमाल ने किये कि वे चरण स्थापित करवायेंग इस हेतु हीराचंद जैन के साथ मौनबाडी के कई चक्कर भी लगाये। लेकिन बाद में पता चला कि यह उनकी नौटंकी मात्र ही थी और सुराना बंधुओं के दबाव के चलते वे भी अपने वादे से मुकर गये और शर्मनाक स्थिति में पदत्याग कर गये।
इसके बाद वर्तमान कार्यकारिणी ने उनके सामधि स्थल के पुर्ननिर्माण का प्रस्ताव लिया बताया जाता है। लेकिन शायद कार्यकारिणी का यह फैसला भी नौटंकी हो या फिर कचरे की टोकरी में चला गया लगता है! पिछले दरवाजे से श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ पर काबिज हो कर उसे अपनी जागीर बनाने वालों और जैन संस्कृति की मर्यादाओं को भंग कर मुनि कान्ति सागर जी की दाहसंस्कार स्थली पर भव्य मंदिर बनाने वाले पूंजीपतियों को इस सवाल का जवाब भी देना है कि क्या मौनबाडी उनकी बपौती है! हम यहां बता दें कि मौनबाडी खरतरगच्छ संघ की सम्पत्ति न तो थी और नहीं है और न ही सुराना/गोलेछा परिवारों की सम्पत्ति है। हमारे इस कथन की पुष्टि हमारे पास उपलब्ध मौनबाडी से सम्बन्धित दस्तावेजों की प्रतियों की इबारत साफ-साफ उजागर करती है!
खरतरगच्छ संघ के पदाधिकारियों और अन्य पूंजीपतियों, टैक्स चोरों, कालाधन रखने वाले कुबेरों को यह भी बताना होगा कि जो जमीन उनकी नहीं है, उस पर किस आधार पर मंदिर का निर्माण किया जा रहा है? साथ ही वे यह भी बतायें कि जो मंदिर वे बना रहे हैं उसमें कितना सफेद धन और कितना काले धन का इस्तेमाल हो रहा है? उन्हें साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि धार्मिक स्थल का व्यवसायिक उपयोग करने वालों को आमजन सख्ती से जवाब देना भी जानता है। आम श्रद्धालु को कृपया अपनी हरकतों से इतना विचलित मत करो कि वे अपना धैर्य खो दें और संघर्ष के पथ पर अग्रसर होने के लिये मजबूर हो जायें ! आगेवान अपने सामाजिक दायीत्व को गम्भीरता से समझें और गैर जुम्मेदारान हरकतों से श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ को संघर्ष का अखाडा न बनायें तो अच्छा रहेगा और इस ही में समाज की बरकत नीहित है और उनकी स्वंय की भलाई भी!
एक बात ओर, गुजरात के जामनगर जिले के एक प्रतिष्ठित औदिच्य ब्राह्मण द्विवेदी गोत्रीय परिवार में 07 जुलाई, 1926 को जन्में और उपाध्याय सुखसागर जी के द्वारा 1936 में दीक्षित मुनि कान्तिसागर जी 29 जुलाई, 1967 में अपने गुरूभाई मुनि मंगलसागर से पुर्नदीक्षित हुए थे। आज उनका पुर्नदीक्षित होने का दिवस भी है। अत: उनके दोषियों को, जो जीवित हैं, को भी आज प्रायश्चित कर लेना चाहिये! क्योंकि उनके जीवन में और उनके देवलोकगमन के बाद भी जो पीड़ा खरतरगच्छ संघ के सेठियों ने दी वह हकीकत में अक्षम्य है!


