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भाजपाई राज में धार्मिक स्थलों का व्यवसायिककरण हो रहा है!-2

जयपुर (अग्रगामी) हमने पिछले अंकों में लिखा था कि भाजपाई बोर्ड, भाजपाई महापौर, उपमहापौर और बहुमत में भाजपाई पार्षदों की फौज के होते हुये भी जयपुर नगर निगम के आधीन हवामहज जोन पूर्व के मनीराम की कोठी के रास्ते में 8 धार्मिक स्थलों को कॉमर्शियल स्वरूप प्रदान करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन राज्य में भाजपाई राज्यपाल, भाजपाई सरकार और विधानसभा में भाजपाई विधायकों का बहुमत होने के बावजूद इन गैर कानूनी एवं बिना इजाजत तामीर लिये भाजपाईयों के संरक्षण में धार्मिक स्थलों पर गैरकानूनी रूप से कब्जा कर उन्हें व्यवसायिक स्थल का स्वरूप प्रदान किया जा रहा है।
हमने अग्रगामी संदेश के पिछले अंक में साया किया था कि मनीराम की कोठी के रास्ते में मनीराम की कोठी के सामने स्थित दिगम्बर जैन मंदिर बैदान को जयपुर नगर निगम, पुरातत्व विभाग, जिला कलक्टर जयपुर और राज्य सरकार से इजाजत लिये बगैर ढहा दिया गया। एक व्यक्ति द्वारा इस मंदिर को अपनी सम्पत्ति बता कर बिना सक्षम इजाजत लिये हुये ढहाने के पीछे गहरी साजिश नजर आने लगी है। जैन मंदिर किसी की भी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होते हैं। श्री दिगम्बर जैन मंदिर बैदान एक सार्वजनिक सम्पत्ति है। वर्ष 1949 में इस मंदिर का प्रबंधन पंच देखते थे। जिनके नाम हैं किस्तूरचंद वल्द फतेहलाल कटारिया, कालूराम वल्द फूलचंद बैनामा, धूपचंद वल्द फूलचंद शाह, किस्तूरचंद वल्द झाझूंलाल बैद व फूलचंद वल्द मोरीलाल ढोलिया है।
दस्तावेज यह भी बताते हैं कि इन पंचों ने अपने कार्यकाल में फूलचंद वल्द जोधराज नरीबा से मंदिर के सलग्र मकानात खरीदे थे। उस बेचान नामे से भी स्पष्ट हो जात है कि मंदिर वर्ष 1949 में ही पंचायती था। दिगम्बर जैन मंदिर बैदान के लिये खरीदी गई जमीन के कागजों पर 5 दिम्बर, 1950 के पंच धूपचंद, फतेहमल कटारिया, सहित अन्य गवाहों के दस्तखत हैं। ऐसी स्थिति में यह मंदिर किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं हो सकता है। अगर नगर निगम में कोई दस्तावेज इस मंदिर को व्यक्तिगत साबित करने वाला नजर आता है तो उसकी जांच होनी चाहिये और जयपुर शहर की सम्वत 25 के नक्क्षे और रेकार्ड से मिलान की जानी चाहिये ताकि असलियत सामने आ सके। दिगम्बर जैन मंदिर को जमीन बेचन वाले फूलचंद बल्द जोधराज निवासी चौकड़ी घाट दरवाजा कोठी मनीराम जी द्वारा पेश किये गये बैनामे जोकि रजिस्ट्रार ने 467 बुक नम्बर-1 वोल्यूम 31 के पेज नम्बर 339 से 443 पर 4 जनवरी, 1950 को दर्ज रजिसट्री का भी अवलोकन किया जाना आवश्यक है जो यह दर्शाता है कि मंदिर किसी की व्यक्तिगत बपौती नहीं है और यह दिगम्बर जैन समाज की सार्वजनिक सम्पत्ति है।
जैसाकि हमने पिछले अंक में लिखा था इस मंदिर में लगभग 32 पूरामहत्व की मूर्तियां रही हैं। जोकि अब टुटे हुये मंदिर में नहीं है। इन 32 पूरामहत्व की मूर्तियों के पुरातत्व विभाग में रजिस्ट्रेशन के लिये दिगम्बर जैन मंदिर बैदान के तत्कालीन मंत्री आनंदीलाल गोदिका ने 30 सितम्बर, 1976 को आवेदन किये थे। जिसका रेकार्ड पुरातत्तव विभाग में भी उपलब्ध होगा। यह दस्तावेज भी दर्शाते हैं कि वर्ष 1976 में भी यह मंदिर पंचायती था और इसके मंत्री आनंदीलाल गोदिका थे। इस पूरे प्रकरण की जांच राज्य सरकार द्वारा करायी जानी आवश्यक है और पुरामहत्व के इस मंदिर को राजसात किया जाना जरूरी हो गया है।
इसके अलावा 3 अन्य जैन धार्मिक स्थलों और अन्य 4 धार्मिक स्थलों जिन्हें धीरे-धीरे व्यवसायिक स्वरूप दिया जा रहा है। इनकी भी जांच की जाय और इन्हें राजसात किया जाये। साथ ही उम्मीद की जानी चाहिये कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और वसुन्धरा राजे सरकार इन मामलों में गम्भीरता से रूचि लेकर सक्षम कार्यवाही करने की व्यवस्था करवायेंगें। क्रमश:

 
AGRAGAMI SANDESH

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